न्यूज़ीलैंड के उत्तरी द्वीप के उत्तर में स्थित काउरी जंगलों में रोग से नुकसान जितना अधिक था, जीवित वनस्पति में कार्बन की मात्रा उतनी ही अधिक घटने की प्रवृत्ति दिखी। वाइताकेरे पर्वतमाला के जंगलों का दोबारा सर्वेक्षण करने वाले अध्ययन में स्वस्थ जंगलों में कार्बन बढ़ा, जबकि रोग के लक्षणों वाले या गंभीर रूप से प्रभावित जंगलों में कार्बन घटा। यह नतीजा दिखाता है कि काउरी रोग का असर अलग-अलग पेड़ों के जीवित रहने से आगे बढ़कर उन जंगलों की कार्बन संग्रह करने की क्षमता पर भी पड़ सकता है, जो लंबे समय से कार्बन जमा करते आए हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
काउरी को माओरी लोगों के लिए गहरे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व वाला ताओंगा (taonga, मूल्यवान विरासत) माना जाता है। बड़े काउरी पेड़ अपने तनों, शाखाओं और जड़ों में कार्बन जमा करते आए हैं, और परिपक्व जंगलों में जमा कार्बन की मात्रा युवा जंगलों से अधिक हो सकती है। इसलिए रोग का असर केवल इस बात से जुड़ा नहीं है कि पेड़ मरते हैं या नहीं, बल्कि इस बात से भी जुड़ा है कि जंगल से किस आकार और अवस्था के पेड़ गायब होते हैं।
काउरी रोग मिट्टी में रहने वाले जल-कवक Phytophthora agathidicida से होता है। यह जड़ों को संक्रमित करता है, जिससे पेड़ों के लिए पानी और पोषक तत्व सोखना मुश्किल हो जाता है। रोग बढ़ने पर पत्तियाँ और शाखाएँ कम होने लगती हैं और पेड़ मर सकता है। लेख के अनुसार, न्यूज़ीलैंड के उत्तरी द्वीप के उत्तर में सैकड़ों से लेकर हज़ारों तक काउरी पेड़ मर चुके हैं। नॉर्थलैंड और ऑकलैंड की वाइताकेरे पर्वतमाला में विशेष रूप से भारी नुकसान दर्ज किया गया।
शोधकर्ताओं ने वाइताकेरे पर्वतमाला के उन सर्वेक्षण स्थलों का दोबारा दौरा किया, जिनका पहली बार 2011–2014 में सर्वेक्षण किया गया था। उन्होंने पेड़ों के आकार और छत्र (पेड़ की शाखाओं और पत्तियों से बना ऊपरी हिस्सा) की स्थिति देखी और मृत पेड़ों तथा नए उगे पेड़ों का रिकॉर्ड रखा। पेड़ों के आकार और विभिन्न प्रजातियों के लिए लकड़ी के सामान्य घनत्व का इस्तेमाल करके उन्होंने जीवित वनस्पति के जैवभार (जीवों का कुल द्रव्यमान) का अनुमान लगाया और गणना की कि लगभग 10 वर्षों में कार्बन भंडार कैसे बदला।
इस खबर का महत्व
शुरुआत में प्रति हेक्टेयर औसतन 169 टन कार्बन वाले जंगलों की तुलना करने पर, स्वस्थ सर्वेक्षण स्थलों में हर साल प्रति हेक्टेयर लगभग 0.8 टन कार्बन बढ़ा। रोग के लक्षण वाले स्थलों में हर साल लगभग 0.1 टन कार्बन घटा, जबकि गंभीर रूप से प्रभावित स्थलों में लगभग 1 टन घटा। स्वस्थ और गंभीर रूप से प्रभावित जंगलों के बीच का अंतर हर साल प्रति हेक्टेयर लगभग 1.8 टन था। इसका मतलब है कि एक ही क्षेत्रफल में रोग से नुकसान की गंभीरता के अनुसार जीवित वनस्पति में जमा कार्बन के बदलाव की दिशा और मात्रा अलग-अलग हो सकती है।
जंगल की उम्र और उसकी संरचना भी महत्वपूर्ण हैं। अध्ययन में परिपक्व जंगलों के सर्वेक्षण स्थलों पर जीवित कार्बन की मात्रा औसतन प्रति हेक्टेयर लगभग 248 टन थी, जो युवा पुनरुत्पन्न जंगलों के लगभग 88 टन से अधिक थी। शोधकर्ताओं के मॉडलिंग में, काउरी वाले जंगलों में जीवित कार्बन का औसतन लगभग आधा हिस्सा काउरी पेड़ों का था; कार्बन से भरपूर जंगलों में यह हिस्सा और भी अधिक था। इसलिए बड़े काउरी पेड़ों के मरने से जीवित वनस्पति में जमा कार्बन काफी घट सकता है। यही एक वजह है कि परिपक्व जंगलों की रक्षा महत्वपूर्ण है।
शोधकर्ताओं की मॉडलिंग से संकेत मिलता है कि गंभीर रूप से प्रभावित, कार्बन से भरपूर जंगल कार्बन जमा करने की स्थिति से कार्बन खोने की स्थिति में जा सकते हैं। मॉडलिंग में यह संभावना भी सामने आई कि वे अतीत में जमा कार्बन की मात्रा वापस हासिल नहीं कर पाएँगे और जीवित जैवभार तथा संग्रह क्षमता के घटे हुए स्तर पर स्थिर हो सकते हैं। हालांकि, यह लंबे समय तक किए गए अवलोकनों से पुष्ट नतीजा नहीं, बल्कि मॉडलिंग से सामने आई एक संभावना है। उदाहरण के लिए, यदि किसी परिपक्व जंगल में काउरी रोग का नुकसान गंभीर हो जाए, तो यह देखना ज़रूरी है कि उस जंगल के जीवित पेड़ों में जमा कार्बन कम हो सकता है।
हालाँकि, इस अध्ययन में केवल जीवित वनस्पति का कार्बन मापा गया। इसमें सीधे तौर पर यह नहीं मापा गया कि मृत पेड़ों, गिरी पत्तियों और मिट्टी में कितना कार्बन बचा रहता है या कितनी तेज़ी से वह वायुमंडल में लौटता है। इसलिए जीवित पेड़ों में कार्बन की कमी को सीधे वायुमंडल में कार्बन की बढ़ोतरी नहीं समझना चाहिए।
पुष्ट तथ्य और जिन बातों का अभी पता नहीं
पुष्ट तथ्य
- वाइताकेरे पर्वतमाला के सर्वेक्षण स्थलों का लगभग 10 साल के अंतराल पर दोबारा सर्वेक्षण करके पेड़ों की स्थिति और जीवित वनस्पति में कार्बन के बदलाव का अनुमान लगाया गया।
- रोग से नुकसान जितना गंभीर था, पेड़ों की वृद्धि से मिलने वाला कार्बन उतना कम हुआ और पेड़ों के कमजोर होने तथा मरने से खोया जाने वाला कार्बन उतना बढ़ा।
- शुरुआत में प्रति हेक्टेयर औसतन 169 टन कार्बन वाले जंगलों में स्वस्थ सर्वेक्षण स्थलों पर हर साल लगभग 0.8 टन कार्बन बढ़ा, जबकि गंभीर रूप से प्रभावित स्थलों पर लगभग 1 टन घटा।
- परिपक्व जंगलों के सर्वेक्षण स्थलों में जीवित कार्बन की मात्रा औसतन प्रति हेक्टेयर लगभग 248 टन थी, जो युवा पुनरुत्पन्न जंगलों के लगभग 88 टन से अधिक थी।
जिन बातों का अभी पता नहीं
- जीवित वनस्पति से गायब हुए कार्बन में से कितना मृत पेड़ों, गिरी पत्तियों और मिट्टी में बचा रहता है और कितना वायुमंडल में लौटता है, इसकी पुष्टि इस अध्ययन से नहीं हुई।
- क्या गंभीर रूप से प्रभावित, कार्बन से भरपूर जंगल अतीत में जमा कार्बन की मात्रा वापस हासिल नहीं कर पाएँगे—यह बात लंबे समय के अवलोकनों में भी सामने आती है या नहीं, इसका पता नहीं है।
- फॉस्फाइट उपचार जैसे प्रबंधन तरीकों का रोग की प्रगति और कार्बन भंडार पर कितना असर पड़ता है, यह नहीं बताया गया।
पाठक किन बातों पर ध्यान दें
- काउरी जंगलों में जाते समय निर्धारित रास्तों का इस्तेमाल करें और रोगजनकों के प्रसार को रोकने की सलाह का पालन करते हुए जंगल में प्रवेश करते तथा बाहर निकलते समय अपने जूते अच्छी तरह साफ करें।
- रोग के प्रबंधन के तरीके के रूप में फॉस्फाइट उपचार की जाँच और उसका इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन केवल इन आँकड़ों से उसके प्रभाव का स्तर तय नहीं किया जा सकता। प्रबंधन के नतीजों पर नज़र रखते समय यह देखना ज़रूरी है कि पेड़ों के लक्षणों के साथ-साथ जंगलों में कार्बन के बदलाव का भी लंबे समय तक अवलोकन किया जा रहा है या नहीं।
- कार्बन भंडार के दावों को देखते समय यह फर्क समझें कि माप में केवल जीवित वनस्पति शामिल है या मृत पेड़, गिरी पत्तियाँ और मिट्टी भी। इस अध्ययन में सीधे तौर पर केवल जीवित वनस्पति को मापा गया।




















