मेलबर्न के पत्रकार रिच हरिडी की किताब 《ट्रिप रिपोर्ट्स: स्टोरीज़ फ्रॉम एन ऑस्ट्रेलियन साइकेडेलिक रेनेसाँ》 (Trip Reports: Stories from an Australian Psychedelic Renaissance, NewSouth) LSD और मतिभ्रमकारी मशरूम जैसे पदार्थों की विशेषताओं, मानसिक स्वास्थ्य उपचार में उनके संभावित उपयोग और ऑस्ट्रेलिया में उनसे जुड़े शोध की पड़ताल करती है। किताब का सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि क्या इनसे उपचार में फायदा होता है। इसमें पूछा गया है कि क्या माइक्रोडोज़िंग (बहुत कम मात्रा में सेवन) उपयोगी है, क्या मतिभ्रमकारी पदार्थों के अप्रत्याशित अनुभवों और उनकी संभावित उपचार क्षमता को अलग किया जा सकता है, और क्या इनसे अकेलेपन तथा सामाजिक अलगाव जैसी समस्याओं से भी निपटा जा सकता है।

किताब जिन संभावनाओं का ज़िक्र करती है, इसका अर्थ यह नहीं कि इन पदार्थों की सुरक्षा साबित हो चुकी है। लेख में उपचार के संभावित लाभों के साथ-साथ मौत और गंभीर शारीरिक लक्षणों के मामले भी दिए गए हैं।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

लेख के मुताबिक, 1960 के दशक के युद्ध-विरोधी प्रतिसंस्कृति आंदोलन में मतिभ्रमकारी पदार्थों का व्यापक इस्तेमाल हुआ था। इसके बाद विभिन्न देशों की सरकारों ने न सिर्फ़ इन पदार्थों, बल्कि उनसे जुड़े शोध पर भी प्रतिबंध लगा दिया। हरिडी की किताब के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया उन आख़िरी देशों में से एक था जिसने 1970 के दशक तक शोध बंद नहीं किया। 2024 में वह उन पहले देशों में से एक बना जिसने दवाइयों के रूप में मतिभ्रमकारी पदार्थों के इस्तेमाल को कानूनी तौर पर फिर से शुरू किया। यह दवाइयों के रूप में इस्तेमाल दोबारा शुरू करने की बात है; इसका अर्थ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि इन पदार्थों के सभी तरह के इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई थी।

किताब में इस बात पर चर्चा है कि क्या मतिभ्रमकारी पदार्थ अवसाद, चिंता और अभिघात के बाद का तनाव विकार (PTSD—एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या जो किसी आघातकारी घटना के बाद हो सकती है) जैसी स्थितियों में मदद कर सकते हैं। उपचार के प्रभाव पर बात करते हुए यह सिर्फ़ दवा पर ही नहीं, बल्कि उपचार के संदर्भ पर भी ध्यान देती है। 1970 के दशक में ऑस्ट्रेलिया में हुए एक क्लिनिकल परीक्षण में शामिल एक महिला ने बताया कि समूह-चिकित्सा के दौरान बचपन के दबे हुए अनुभवों पर आत्मचिंतन करना कठिन और पीड़ादायक था, लेकिन उपचार से फायदा हुआ और उसका जीवन स्थिर हुआ।

हरिडी का कहना है कि मृत्यु को लेकर चिंता और भय से जूझ रहे, जीवन के अंतिम चरण में पहुँचे मरीज़ों पर किए गए शोध में भी अच्छे नतीजे मिले। उनके ज़िक्र किए नतीजों में चिंता और अवसाद में कमी के साथ-साथ मृत्यु का डर और मनोबल में गिरावट कम होना, आध्यात्मिक कल्याण और जीवन की गुणवत्ता में सुधार शामिल हैं। हालांकि, लेख में शोध का आकार या क्लिनिकल परीक्षण की रूपरेखा नहीं दी गई है, इसलिए यह तय करना मुश्किल है कि ये नतीजे किन लोगों में और किन परिस्थितियों में सामने आए।

इस खबर का मतलब

किताब में बताए गए नतीजे दिखाते हैं कि कुछ मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के संभावित उपचार के तौर पर मतिभ्रमकारी पदार्थों की पड़ताल की जा रही है। इसमें यह भी बताया गया है कि शोधकर्ताओं ने MDMA में खुशी का एहसास और दूसरों से जुड़ाव तथा सहानुभूति जैसे सामाजिक व्यवहार को बढ़ावा देने वाले प्रभाव पाए। अयाहुआस्का लेने वाले कुछ लोगों के ऐसे अनुभव भी दिए गए हैं जिन्होंने बताया कि वे गंभीर अवसाद से उबरे और उनका मन बेहतर हुआ। लेकिन इन विवरणों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि सभी मरीज़ों को एक जैसे लाभ होंगे या उपचार के बाद ये प्रभाव कितने समय तक बने रहेंगे।

दूसरी ओर, जोखिम सिर्फ़ काल्पनिक नहीं हैं। किताब में 2024 के एक मतिभ्रमकारी मशरूम सेवन सत्र का ज़िक्र है, जिसमें एक महिला की मौत हो गई और दूसरे प्रतिभागियों को लकवा, बोलने या खड़े होने में कठिनाई और सांस लेने में दिक्कत हुई। हालांकि, लेख मौत और दुष्प्रभावों का कारण नहीं बताता। अयाहुआस्का के मामले में भी उल्लेखनीय नकारात्मक प्रभावों का ज़िक्र है। DMT (एक प्रकार का मतिभ्रमकारी पदार्थ) लेने वाले प्रतिभागियों ने दूसरी जगहों का अनुभव करने का वर्णन किया, जहाँ एल्फ़, कीट और एलियन मौजूद थे। बताया गया कि उनमें से कुछ को यक़ीन था कि वह जगह कोई वास्तविक, ठोस स्थान या परग्रही क्षेत्र थी।

हरिडी जिस मुख्य कठिनाई की ओर ध्यान दिलाते हैं, वह यह है कि मतिभ्रमकारी पदार्थों की मन बदलने वाली विशेषता ही उपचार की संभावना और जोखिम—दोनों पैदा करती है। अनुभव जितना तीव्र और अप्रत्याशित होगा, लाभ की उम्मीद करने वाला व्यक्ति भी पहले से यह तय नहीं कर सकता कि उसे कैसा अनुभव होगा। उदाहरण के लिए, अवसाद के लक्षणों के कारण उपचार पर विचार कर रहे किसी व्यक्ति को सिर्फ़ कुछ लोगों के बेहतर होने के अनुभव नहीं देखने चाहिए, बल्कि उपचार के प्रभावों की पुष्टि करने वाले शोध का दायरा और दुष्प्रभावों तथा सुरक्षा प्रबंधन से जुड़ी जानकारी भी देखनी चाहिए।

पुष्ट तथ्य और वे बातें जिनका अभी पता नहीं

पुष्ट तथ्य

  • किताब LSD और मतिभ्रमकारी मशरूम जैसे पदार्थों की विशेषताओं तथा मानसिक स्वास्थ्य उपचार में उनकी संभावित भूमिका पर चर्चा करती है।
  • हरिडी का कहना है कि जीवन के अंतिम चरण में पहुँचे मरीज़ों पर हुए शोध में चिंता और अवसाद कम होने के अच्छे नतीजे मिले।
  • इसमें MDMA के सामाजिक व्यवहार को बढ़ावा देने वाले प्रभावों और अयाहुआस्का लेने वालों के सकारात्मक अनुभवों का ज़िक्र है; साथ ही अयाहुआस्का के नकारात्मक प्रभावों का भी उल्लेख है।
  • किताब के अनुसार, 2024 के एक मतिभ्रमकारी मशरूम सत्र में एक व्यक्ति की मौत हुई और दूसरे प्रतिभागियों में गंभीर लक्षण दिखाई दिए।
  • DMT के अनुभवों के बारे में प्रतिभागियों के वर्णनों में अजीब प्राणियों और दूसरी जगहों का ज़िक्र शामिल है।

वे बातें जिनका अभी पता नहीं

  • लेख में बताए गए मतिभ्रमकारी पदार्थों से उपचार संबंधी शोध का आकार और क्लिनिकल परीक्षण की विशिष्ट रूपरेखा क्या थी?
  • उपचार खत्म होने के बाद उसके प्रभाव कितने समय तक बने रहते हैं?
  • 2024 के मतिभ्रमकारी मशरूम सत्र में हुई मौत और प्रतिभागियों के दुष्प्रभाव किस कारण से हुए?

पाठकों को किन बातों की जाँच करनी चाहिए

  • उपचार की संभावना से जुड़ी खबर पढ़ते समय देखें कि बताए गए नतीजे किन मरीज़ों और किस शोध से जुड़े हैं, और क्या शोध का आकार तथा उसकी रूपरेखा भी दी गई है।
  • उपचार पर विचार करते समय सिर्फ़ सकारात्मक अनुभवों के आधार पर फैसला न करें; अप्रत्याशित प्रतिक्रियाओं, दुष्प्रभावों और सुरक्षा प्रबंधन के तरीकों की जानकारी भी देखें।
  • ऑस्ट्रेलिया के 2024 के कदम को दवाइयों के रूप में इस्तेमाल दोबारा शुरू करने के तौर पर बताया गया है। अनुमति का विशिष्ट दायरा या व्यक्तियों के लिए उपलब्ध प्रक्रिया सिर्फ़ इस लेख से स्पष्ट नहीं होती, इसलिए इसे आम तौर पर इस्तेमाल की अनुमति के रूप में न समझें।