नागोया के जूडो फाइनल में उठा झंडे का विवाद
३ अक्टूबर को जापान के नागोया स्थित आइची इंटरनेशनल एरीना में २०२६ आइची-नागोया एशियाई खेलों का जूडो मिश्रित टीम फाइनल हुआ। जापान और कज़ाख़स्तान के मुकाबले के दौरान कुछ जापानी दर्शकों ने ‘उगते सूरज’ वाला झंडा फैलाकर जापानी टीम का उत्साह बढ़ाया।
झंडा दिखने के बाद विवाद खड़ा हो गया। कोरियाई जूडो अधिकारियों ने खेल आयोजकों से हस्तक्षेप और कार्रवाई करने का अनुरोध किया, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार वहां कोई स्पष्ट कार्रवाई दिखाई नहीं दी।
विवाद का केंद्र यह सवाल है कि बड़े अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों में राजनीतिक या ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील प्रतीकों पर लागू नियमों को सभी स्थलों पर एक समान तरीके से लागू किया जा रहा है या नहीं।
दो झंडों में अंतर और ऐतिहासिक संवेदनशीलता
जापान का सामान्य राष्ट्रीय ध्वज सफेद पृष्ठभूमि पर लाल गोले वाला झंडा है, जिसे ‘हिनोमारू’ कहा जाता है। विवादित ‘उगते सूरज’ वाले झंडे में लाल सूरज से निकलती किरणें दिखाई जाती हैं। दोनों प्रतीक एक जैसे नहीं हैं।
‘उगते सूरज’ वाला डिजाइन जापानी साम्राज्यवादी दौर और उस समय की सेना से जुड़ा रहा है। कोरिया सहित कई पड़ोसी देशों में इसे जापान के औपनिवेशिक शासन और युद्धकालीन इतिहास की याद दिलाने वाला प्रतीक माना जाता है। इसी कारण खेलों में इसे लहराना सिर्फ प्रशंसक-समर्थन का मामला नहीं रहता; यह ऐतिहासिक स्मृतियों और राजनीतिक संवेदनशीलता से भी जुड़ जाता है।
इतिहास से जुड़ी ऐसी प्रतीकात्मक वस्तुएं अलग-अलग लोगों के लिए अलग अर्थ रख सकती हैं। किसी दर्शक को वह अपनी टीम का पारंपरिक निशान लग सकता है, जबकि किसी दूसरे देश के दर्शक को वही चिह्न अतीत के उत्पीड़न और सैन्य विस्तार की याद दिला सकता है।
खेल आयोजनों में प्रतीकों पर नियंत्रण क्यों होता है?
ओलंपिक, विश्व कप और एशियाई खेलों जैसे आयोजनों में दर्शकों के लिए ऐसे संकेतों और वस्तुओं पर नियम बनाए जा सकते हैं जिन्हें राजनीतिक संदेश या उकसावे के रूप में देखा जा सकता है। उद्देश्य यह होता है कि खेल का मैदान राष्ट्रीय विवादों का मंच न बने और खिलाड़ियों तथा दर्शकों के लिए सुरक्षित माहौल बना रहे।
- आयोजक प्रवेश से पहले दर्शकों के सामान की जांच कर सकते हैं।
- प्रतिबंधित वस्तुओं की सूची या प्रवेश संबंधी निर्देश जारी किए जा सकते हैं।
- नियम तोड़ने पर किसी वस्तु को हटाने या दर्शक को कार्रवाई की चेतावनी देने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
इन उपायों का असर तभी होता है जब नियम स्पष्ट हों और सभी खेल स्थलों तथा मुकाबलों में समान ढंग से लागू किए जाएं।
बेसबॉल फाइनल के लिए पहले दी गई थी मनाही की सूचना
जूडो मुकाबले से कुछ दिन पहले, २७ सितंबर को, खेल आयोजकों ने जापान और दक्षिण कोरिया के बीच होने वाले बेसबॉल फाइनल के लिए एक सूचना लगाई थी। उसमें ‘उगते सूरज’ वाले झंडे को मैदान में लाने पर रोक की बात कही गई थी। बताया गया था कि यह कदम संभावित विवाद को रोकने के लिए उठाया गया।
इस पृष्ठभूमि में जूडो फाइनल के दौरान वही झंडा दिखाई देना आयोजकों के निर्देशों और उनके पालन पर सवाल खड़े करता है। बेसबॉल मुकाबले के लिए जारी सूचना यह दिखाती थी कि आयोजक इस प्रतीक से जुड़े विवाद से परिचित थे; लेकिन जूडो मुकाबले में झंडा सामने आने पर तुरंत कोई स्पष्ट हस्तक्षेप नजर नहीं आया।
नियम और उनका पालन—दो अलग बातें
किसी वस्तु पर रोक की घोषणा करना पहला कदम है। इसके बाद प्रवेश द्वारों पर जांच, दर्शकों को नियम समझाना और मुकाबले के दौरान उल्लंघन होने पर समय पर कार्रवाई करना भी जरूरी होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी स्टेडियम में कांच की बोतलें लाने पर रोक हो, तो केवल सूचना-पट लगाना काफी नहीं होगा; प्रवेश पर जांच और नियम तोड़ने की स्थिति में कार्रवाई भी होनी चाहिए।
इस मामले में खबर के अनुसार, कोरियाई जूडो अधिकारियों ने आयोजकों से कार्रवाई मांगी, लेकिन कोई उल्लेखनीय कदम नहीं दिखा। यह स्पष्ट नहीं है कि झंडा मैदान में कैसे पहुंचा या अधिकारियों ने अनुरोध के बाद अंदरूनी स्तर पर क्या कदम उठाए।
विवाद का असर खेल से आगे तक जा सकता है
खेल प्रतियोगिताएं देशों के बीच संपर्क और आपसी सम्मान का अवसर होती हैं। लेकिन दर्शक-दीर्घा में ऐतिहासिक रूप से विवादित प्रतीक दिखने पर ध्यान खिलाड़ियों के प्रदर्शन से हटकर देशों के पुराने मतभेदों पर जा सकता है। इससे दूसरे देशों के खिलाड़ियों और समर्थकों को भी असहजता महसूस हो सकती है।
विवाद का असर केवल किसी एक मैच तक सीमित नहीं रहता। आयोजकों की निष्पक्षता, दर्शकों के लिए नियमों की समानता और मेजबान देश की जिम्मेदारी पर भी चर्चा शुरू हो सकती है। ऐसी स्थिति में स्पष्ट जानकारी और समय पर कार्रवाई तनाव को बढ़ने से रोकने में मदद कर सकती है।
आगे आयोजकों से क्या अपेक्षा होगी?
आयोजकों के सामने अब नियमों को स्पष्ट करने और उन्हें हर खेल स्थल पर समान रूप से लागू करने की चुनौती है। यदि किसी प्रतीक पर रोक है, तो दर्शकों को पहले से जानकारी मिलनी चाहिए और प्रवेश तथा मुकाबले के दौरान उस नियम का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- दर्शकों के लिए प्रतिबंधित प्रतीकों और वस्तुओं की जानकारी साफ भाषा में दी जाए।
- अलग-अलग खेल स्थलों पर जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया एक जैसी रखी जाए।
- नियम के उल्लंघन पर अधिकारियों की जिम्मेदारी और उठाए जाने वाले कदम स्पष्ट हों।
- ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर संबंधित देशों और खेल प्रतिनिधियों से संवाद किया जाए।
जूडो फाइनल की घटना ने दिखाया कि प्रतिबंध की सूचना देना पर्याप्त नहीं है। अंतरराष्ट्रीय खेलों में भरोसा बनाए रखने के लिए नियमों का स्पष्ट, निष्पक्ष और लगातार पालन भी उतना ही जरूरी है।



















