कोरिया के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (국가인권위원회; NHRCK) ने मृत्युदंड के खिलाफ विश्व दिवस के 24वें आयोजन के अवसर पर मृत्युदंड व्यवस्था खत्म करने की बहस को नए सिरे से आगे बढ़ाने का आह्वान किया। अध्यक्ष आन चांग-हो ने कहा कि दक्षिण कोरिया ने 30 दिसंबर 1997 के बाद से किसी को फांसी नहीं दी है और फांसी पर रोक के दौरान भी सार्वजनिक सुरक्षा तथा स्थिर आपराधिक न्याय प्रणाली कायम रखी है। उन्होंने इस अनुभव को केवल फांसी पर रोक से आगे की एक उपलब्धि बताते हुए कहा कि अब इस बात पर बहस करने का समय है कि मृत्युदंड को कानून में बनाए रखा जाए या नहीं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
इस मांग का मुख्य तर्क यह है कि लंबे समय से फांसी न दिए जाने के तथ्य को मृत्युदंड व्यवस्था बनाए रखने या न रखने पर फिर से विचार करने का आधार बनाया जाए। फांसी पर रोक और कानूनन मृत्युदंड खत्म करना एक ही बात नहीं है। इसलिए, केवल इस तथ्य से कि वास्तव में किसी को फांसी नहीं दी गई है, यह नहीं माना जा सकता कि कानून से मृत्युदंड हट चुका है। अध्यक्ष आन ने इसी कानूनी स्थिति को बनाए रखने या बदलने पर बहस करने का आह्वान किया।
दूसरी खबर में इस मांग को अधिक विस्तार से बताया गया। खबर के अनुसार, अध्यक्ष आन ने मृत्युदंड खत्म करने के लिए विधायी और संस्थागत दिशा की समीक्षा करने तथा नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा के दूसरे वैकल्पिक प्रोटोकॉल—यानी मृत्युदंड समाप्ति प्रोटोकॉल—में शामिल होने की पहल करने की मांग की। खबर के मुताबिक, यह प्रोटोकॉल मृत्युदंड खत्म करने के उद्देश्य से दिसंबर 1989 में अपनाया गया था और जर्मनी, फ्रांस तथा ऑस्ट्रेलिया समेत 92 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। इस मांग की खबर आने और सदस्यता की वास्तविक प्रक्रिया शुरू होने के बीच फर्क करना चाहिए।
एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, पिछले वर्ष के अंत तक 145 देशों ने कानूनन या व्यवहारतः मृत्युदंड खत्म कर दिया था। यह दुनिया के कुल देशों का लगभग तीन-चौथाई है। एक अन्य खबर ने जोड़ा कि इनमें से 113 देशों ने मृत्युदंड पूरी तरह समाप्त कर दिया है। ये आंकड़े अंतरराष्ट्रीय रुझान दिखाते हैं, लेकिन अपने आप में यह निष्कर्ष नहीं देते कि दक्षिण कोरिया को किस तरह का कानूनी संशोधन या नीति अपनानी चाहिए।
दूसरी खबर में अध्यक्ष आन की यह टिप्पणी भी दी गई कि फांसी दिए जाने के बाद उसे पलटा नहीं जा सकता और ऐसे मामले रहे हैं जिनमें फांसी के बाद दोबारा सुनवाई में दोषी को निर्दोष पाया गया। इससे यह मुद्दा उठता है कि सजा की गंभीरता पर चर्चा करते समय गलत फैसले की संभावना और उसे पलट न पाने की स्थिति—दोनों पर विचार किया जाना चाहिए। हालांकि, इस खबर के आधार पर किसी खास व्यवस्था या व्यक्तिगत मामले की पूरी परिस्थितियों की पुष्टि नहीं की जा सकती।
इस खबर का अर्थ
यदि मृत्युदंड खत्म करने की बहस गंभीरता से आगे बढ़ती है, तो सजा नीति और आपराधिक न्याय प्रणाली की दिशा सीधे तौर पर प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। फांसी पर लंबे समय से लगी रोक इस बहस का शुरुआती आधार हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सामाजिक सहमति बन गई है या कानून में संशोधन हो गया है। वास्तविक बदलाव के लिए कानून और संस्थागत दिशा की समीक्षा करने तथा पीड़ितों की सुरक्षा और जनसुरक्षा पर साथ-साथ चर्चा करने की चुनौती बनी हुई है।
पीड़ितों और उनके परिवारों का दुख मृत्युदंड खत्म करने की बहस में विचार करने योग्य एक अहम पहलू बताया गया। खबर के अनुसार, अध्यक्ष आन ने यह भी कहा कि पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा और सामाजिक सुरक्षा-जाल को मजबूत करने के काम को मृत्युदंड बनाए रखने के सवाल से अलग समझना चाहिए। इससे यह मुद्दा उठ सकता है कि पीड़ितों की सहायता और सुरक्षा बढ़ाने के उपायों को मृत्युदंड बनाए रखने के पक्ष में विकल्प की तरह न देखा जाए; और, इसके उलट, मृत्युदंड खत्म करने की बहस में पीड़ितों की आवाज को बाहर न रखा जाए। हालांकि, खबर में यह नहीं बताया गया है कि उनकी बात सुनने और उसे बहस में शामिल करने की प्रक्रिया क्या होगी।
मसलन, यदि मृत्युदंड खत्म करने पर विचार-विमर्श हो, तो यह देखा जा सकता है कि क्या उसमें पीड़ितों और उनके परिवारों के अनुभव सुनने की प्रक्रिया तथा जनसुरक्षा से जुड़े उपाय, दोनों पेश किए जाते हैं। यह बहस के संभावित तरीके का केवल एक उदाहरण है; इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसी प्रक्रिया अभी शुरू की जा रही है।
संबंधित कानून और सहायता संबंधी जानकारी
उपलब्ध कानूनी मार्गदर्शिका के अनुसार, आपराधिक कानून (형법) मृत्युदंड को कारावास, हिरासत और जुर्माने समेत नौ प्रकार की सजाओं में से एक के रूप में निर्धारित करता है (आपराधिक कानून का अनुच्छेद 41)। इसलिए, फांसी पर रोक की स्थिति और कानून में सजा के प्रकारों की सूची से मृत्युदंड हटाना दो अलग-अलग मुद्दे हैं। खबर में उठाया गया कानूनन मृत्युदंड बनाए रखने या न रखने का सवाल इस अंतर को समझने के लिहाज से आपराधिक कानून में दी गई सजाओं की सूची से जुड़ता है।
हालांकि, उपलब्ध कानूनी मार्गदर्शिका में सजाओं के प्रकार तथा सजा कम करने और उसे लागू करने के बारे में सामान्य जानकारी है; इसमें मृत्युदंड खत्म करने के विधेयक, प्रोटोकॉल में शामिल होने की प्रक्रिया या पीड़ित सहायता के लिए आवेदन करने का तरीका नहीं बताया गया है। इसलिए, केवल इस सामग्री के आधार पर ठोस विधायी पहल की स्थिति या उपलब्ध सहायता व्यवस्थाओं के बारे में पक्की बात नहीं कही जा सकती। कानून का वास्तविक प्रयोग जानने के लिए संबंधित तथ्यों और लागू कानूनों की अलग से पुष्टि करनी होगी।
अलग-अलग खबरों में बताई गई बातें
पहली खबर में फांसी पर रोक के अनुभव, मृत्युदंड खत्म करने के अंतरराष्ट्रीय रुझान और पीड़ितों तथा उनके परिवारों के दुख पर विचार करने की जरूरत पर जोर दिया गया। दूसरी खबर में इसके अलावा मृत्युदंड समाप्ति प्रोटोकॉल में शामिल होने की पहल की मांग, फांसी के बाद दोबारा सुनवाई में निर्दोष पाए गए लोगों के मामले, और पीड़ितों की सुरक्षा तथा सामाजिक सुरक्षा-जाल को मृत्युदंड बनाए रखने के सवाल से अलग देखने की बात जोड़ी गई। स्मृति दिवस का नाम भी दोनों खबरों में अलग था: पहली में “मृत्युदंड के खिलाफ विश्व दिवस” और दूसरी में “विश्व मृत्युदंड उन्मूलन दिवस” कहा गया।
पुष्ट तथ्य और जो बातें अभी अज्ञात हैं
पुष्ट तथ्य
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मृत्युदंड के खिलाफ विश्व दिवस के 24वें आयोजन के अवसर पर मृत्युदंड व्यवस्था खत्म करने की बहस का आह्वान किया।
- अध्यक्ष आन चांग-हो ने कहा कि दक्षिण कोरिया ने 30 दिसंबर 1997 के बाद से किसी को फांसी नहीं दी है।
- एमनेस्टी इंटरनेशनल के हवाले से दिए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष के अंत तक 145 देशों ने कानूनन या व्यवहारतः मृत्युदंड खत्म कर दिया था।
- दूसरी खबर के अनुसार, अध्यक्ष आन ने मृत्युदंड समाप्ति प्रोटोकॉल में शामिल होने की पहल करने की मांग की।
- अध्यक्ष आन ने कहा कि मृत्युदंड खत्म करने की बहस में पीड़ितों और उनके परिवारों के दुख, पीड़ितों की सुरक्षा तथा जनसुरक्षा पर विचार किया जाना चाहिए।
जो बातें अभी अज्ञात हैं
- यह पता नहीं है कि दक्षिण कोरिया में मृत्युदंड खत्म करने के लिए कोई ठोस विधायी या नीतिगत कदम उठाया जा रहा है या नहीं; और यदि उठाया जा रहा है, तो उसकी समय-सारणी और विषय क्या हैं।
- खबर में यह नहीं बताया गया है कि मृत्युदंड समाप्ति प्रोटोकॉल में शामिल होने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हुई है या नहीं।
- मृत्युदंड खत्म करने की बहस में पीड़ितों और उनके परिवारों की राय तथा जनमत को शामिल करने की ठोस प्रक्रिया की भी पुष्टि नहीं हुई है।
पाठकों को किन बातों पर ध्यान देना चाहिए
- फांसी पर रोक और कानूनन मृत्युदंड खत्म करने के बीच फर्क करते हुए यह देखना जरूरी है कि संबंधित विधायी बहस वास्तव में आगे बढ़ रही है या नहीं।
- यह देखा जा सकता है कि मृत्युदंड समाप्ति प्रोटोकॉल में शामिल होने की मांग केवल नीतिगत समीक्षा तक सीमित है या औपचारिक पहल की प्रक्रिया में बदल रही है।
- यह देखना उपयोगी होगा कि बहस के दौरान पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा और जनसुरक्षा के उपाय ठोस रूप से पेश किए जाते हैं या नहीं, और पीड़ितों तथा उनके परिवारों की राय शामिल करने का तरीका तैयार किया जाता है या नहीं।
संदर्भ
- दंड संहिता के तहत दंड के प्रकार तथा दंड में कमी और निष्पादन संबंधी मार्गदर्शिका
- संदर्भित अन्य रिपोर्ट: hani.co.kr



















