नार्कोलेप्सी और जैविक मानसिक विकारों को 2021 में पहली बार विकलांगता-मान्यता प्राप्त रोगों में शामिल किया गया, लेकिन वास्तव में विकलांगता के रूप में पंजीकृत लोगों की संख्या इलाज करा रहे लोगों की संख्या से काफी अलग है। अप्रैल 2021 से 2026 की पहली छमाही तक, नार्कोलेप्सी के आधार पर विकलांगता-स्तर की समीक्षा के लिए आवेदन करने वाले 41 लोगों में से 5 को पंजीकरण के लिए पात्र ठहराया गया—12.2%। जैविक मानसिक विकार के लिए 696 आवेदकों में से 571, यानी 82.0%, पंजीकृत हुए। दोनों रोगों के फैसलों में बड़ा अंतर होने के बीच, खास तौर पर यह सवाल चर्चा में आया कि क्या नार्कोलेप्सी के मानदंड मरीजों के वास्तविक लक्षणों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आने वाली पाबंदियों को पर्याप्त रूप से दर्शाते हैं।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

सरकार ने अप्रैल 2021 में विकलांग व्यक्ति कल्याण अधिनियम (장애인복지법) के अधीनस्थ नियमों में संशोधन करके जैविक मानसिक विकार और नार्कोलेप्सी को विकलांगता-मान्यता प्राप्त रोगों में जोड़ा। जैविक मानसिक विकार में मस्तिष्क की नसों को नुकसान के कारण भ्रम, आवाज़ें सुनाई देना या व्यक्तित्व में बदलाव जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, जबकि नार्कोलेप्सी के कारण दिन में अत्यधिक नींद आती है। खबर के अनुसार, 2003 के बाद 18 साल में पहली बार विकलांगता-मान्यता प्राप्त रोगों की सूची का विस्तार किया गया था।

किसी रोग को मान्यता-प्राप्त रोगों की सूची में शामिल करने का अर्थ यह नहीं है कि उसका इलाज करा रहे हर व्यक्ति को विकलांगता के रूप में पंजीकृत किया जाएगा। खबर में बताए गए मौजूदा मानदंडों के अनुसार, दोनों रोगों के मामले में विकलांगता का निदान तभी हो सकता है जब 2 साल से अधिक समय तक लगातार इलाज कराने के बावजूद सुधार न हुआ हो और विकलांगता स्थायी हो गई हो। नार्कोलेप्सी के मामले में इसके साथ-साथ पॉलीसोम्नोग्राफी (नींद के दौरान जैविक संकेतों को मापने वाली जांच) आदि में असामान्य निष्कर्ष और मनोविकारी लक्षण भी होने चाहिए।

इलाज करा रहे लोगों और पंजीकृत लोगों की संख्या के बीच के अंतर को समझने के लिए ये मानदंड अहम हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा सेवा (국민건강보험공단) के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में जैविक मानसिक विकार का इलाज कराने वाले लोगों की संख्या लगभग 92,000 थी, लेकिन इसमें अलग-अलग वर्षों में एक ही मरीज को बार-बार गिना गया है। नार्कोलेप्सी का इलाज कराने वाले लोगों की संख्या 45,000 बताई गई, जबकि पंजीकृत लोगों की संख्या 5 थी। खबर ने इसे इलाज करा रहे लोगों की संख्या के मुकाबले लगभग 0.01% बताया, लेकिन इलाज करा रहे लोगों और विकलांगता-समीक्षा के आवेदकों की गिनती अलग-अलग तरीके से की गई है। इसलिए इस अनुपात को किसी व्यक्तिगत मरीज के विकलांगता-पंजीकरण हासिल करने की संभावना नहीं समझना चाहिए।

इस खबर का अर्थ

नार्कोलेप्सी के लिए विकलांगता-समीक्षा के आवेदकों में से 12.2% को पंजीकरण के लिए पात्र ठहराया गया—यह उन लोगों के बीच का परिणाम है जो आवेदन के चरण तक पहुंचे। इसके विपरीत, इलाज करा रहे लोगों की संख्या के मुकाबले पंजीकरण दर एक बड़े इलाजरत समूह और पंजीकृत लोगों की संख्या की तुलना है। पंजीकरण कम होने के तथ्य को समझते समय आवेदन करने या न करने और फैसले के मानदंडों के प्रभाव को आपस में गड्डमड्ड होने से बचाने के लिए इन दोनों को अलग-अलग समझना चाहिए। हालांकि, खबर में दी गई जानकारी से यह पता नहीं चलता कि मरीजों ने आवेदन क्यों नहीं किया या आवेदन प्रक्रिया का क्या प्रभाव पड़ा।

नार्कोलेप्सी के मुख्य लक्षणों और फैसले की आवश्यकताओं के बीच का अंतर भी चर्चा का विषय है। कोरिया नार्कोलेप्सी रोगी संघ (한국기면병환우협회) के अध्यक्ष ली हान ने कहा कि दिन में नींद आना और कैटाप्लेक्सी (अचानक मांसपेशियों की ताकत चली जाना) मरीजों के मुख्य लक्षण हैं, लेकिन मौजूदा मानदंडों में मनोविकारी लक्षण भी मांगे जाते हैं, जिससे अधिकांश लोगों के लिए पात्र ठहराया जाना मुश्किल हो जाता है। इस आपत्ति का मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि किसी रोग को विकलांगता-मान्यता प्राप्त रोगों में शामिल किया गया है या नहीं, बल्कि यह भी है कि उस रोग के कारण रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आने वाली कठिनाइयों को फैसले के मानदंडों में किस तरह शामिल किया जाता है।

जैविक मानसिक विकार के मामले में भी इलाजरत समूह और पंजीकृत समूह की बनावट अलग थी। इलाजरत लोगों में 70 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों का हिस्सा 53.5% और महिलाओं का हिस्सा 53.0% था, जबकि पंजीकृत लोगों में 70 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 17 लोग (3.0%) थे और पुरुषों का हिस्सा 76.7% था। केवल इस अंतर के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि बुज़ुर्गों या महिलाओं का पंजीकरण कम क्यों हुआ। हालांकि, इससे यह ज़रूर दिखता है कि पूरे इलाजरत समूह और पंजीकृत समूह को एक जैसा मानना मुश्किल है।

उदाहरण के लिए, नार्कोलेप्सी का इलाज करा रहे किसी व्यक्ति को दिन में नींद आने के कारण रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पाबंदियां झेलनी पड़ सकती हैं। फिर भी, खबर में बताए गए मानदंडों के अनुसार, पंजीकरण का नतीजा इस बात पर निर्भर कर सकता है कि इलाज की अवधि और विकलांगता के स्थायी होने, जांच के निष्कर्षों और मनोविकारी लक्षणों की शर्तों का अलग-अलग आकलन कैसे किया जाता है। यह एक काल्पनिक उदाहरण है और इसका अर्थ किसी व्यक्तिगत आवेदक के फैसले का अनुमान लगाना नहीं है। सांसद सॉ मि-ह्वा ने कहा कि विकलांगता-पंजीकरण व्यवस्था में पूरी तरह से सुधार किया जाना चाहिए, ताकि लोगों को ऐसी सेवाओं से जोड़ा जा सके जो उनकी वास्तविक ज़िंदगी की पाबंदियों को दूर करें।

संबंधित व्यवस्था और सहायता संबंधी जानकारी

खबर में जिस व्यवस्था-परिवर्तन की पुष्टि होती है, वह अप्रैल 2021 में विकलांग व्यक्ति कल्याण अधिनियम (장애인복지법) के अधीनस्थ नियमों में संशोधन करके दोनों रोगों को विकलांगता-मान्यता प्राप्त रोगों में शामिल करना है। साथ में बताए गए फैसले के मानदंडों के अनुसार, दोनों रोगों में 2 साल से अधिक इलाज के बावजूद सुधार न होना और विकलांगता का स्थायी हो जाना आवश्यक है; नार्कोलेप्सी के लिए मनोविकारी लक्षणों की शर्त भी है। इसलिए केवल यह तथ्य कि कोई रोग मान्यता-प्राप्त सूची में शामिल है, पंजीकरण की गारंटी नहीं देता।

खबर में आवेदन के लिए आवश्यक दस्तावेज़ों, समीक्षा के अलग-अलग चरणों की प्रक्रिया या पंजीकरण से इनकार किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने अथवा दोबारा समीक्षा कराने के तरीकों के बारे में जानकारी नहीं दी गई है। यह भी पुष्टि नहीं हुई कि सरकार फैसले के मानदंडों में बदलाव की योजना बना रही है या नहीं। इसलिए केवल इस खबर के आधार पर आवेदन की पात्रता या इनकार के बाद अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के बारे में निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इस व्यवस्था का उपयोग करने पर विचार कर रहे पाठकों को वर्तमान आधिकारिक मानदंडों और दिशा-निर्देशों की अलग से जांच करनी चाहिए।

पुष्टि किए गए तथ्य और अब भी अज्ञात बातें

पुष्टि किए गए तथ्य

  • अप्रैल 2021 से 2026 की पहली छमाही तक, जैविक मानसिक विकार के लिए समीक्षा के 696 आवेदकों में से 571 (82.0%) पंजीकृत हुए।
  • इसी अवधि में, नार्कोलेप्सी के लिए समीक्षा के 41 आवेदकों में से 5 (12.2%) को पंजीकरण के लिए पात्र ठहराया गया।
  • दोनों रोगों के मानदंडों में 2 साल से अधिक इलाज के बावजूद सुधार न होना और विकलांगता का स्थायी हो जाना शामिल है।
  • खबर के अनुसार, नार्कोलेप्सी के लिए जांच में असामान्य निष्कर्षों के अलावा मनोविकारी लक्षण भी होने चाहिए।

अब भी अज्ञात बातें

  • क्या सरकार की फैसले के मानदंडों को वास्तव में बदलने की योजना है?
  • जिन आवेदकों का पंजीकरण अस्वीकार किया गया, वे आपत्ति कैसे दर्ज करा सकते हैं या दोबारा समीक्षा कैसे पा सकते हैं, और इस प्रक्रिया के नतीजे क्या हैं?
  • क्या फैसले के मानदंडों के अलावा आवेदन प्रक्रिया या संबंधित जानकारी की कमी ने भी पंजीकरण की कम संख्या में भूमिका निभाई?

पाठकों को क्या जांचना चाहिए

  • यदि आप पंजीकरण पर विचार कर रहे हैं, तो आधिकारिक दिशा-निर्देशों में अपने रोग पर लागू नवीनतम फैसले के मानदंड और आवश्यक प्रक्रिया की जांच करें। इस खबर से जमा किए जाने वाले दस्तावेज़ों या समीक्षा के हर चरण की आवश्यकताओं का पता नहीं चलता।
  • नार्कोलेप्सी के मामले में ध्यान रखें कि खबर में 2 साल से अधिक इलाज, विकलांगता का स्थायी होना, जांच के निष्कर्ष और मनोविकारी लक्षणों की शर्तों का एक साथ उल्लेख किया गया है; लेकिन केवल खबर के आधार पर किसी व्यक्ति के पात्र ठहराए जाने की संभावना का आकलन न करें।
  • खबर में पंजीकरण से इनकार किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने या दोबारा समीक्षा कराने की प्रक्रिया पर चर्चा नहीं की गई। यदि आप ऐसी स्थिति में हैं, तो लागू आधिकारिक प्रक्रिया और समय-सीमा की अलग से जांच करें।