पदकों की उम्मीद, नतीजा सिर्फ़ एक कांस्य
दक्षिण कोरिया की कुश्ती टीम २०२६ आइची-नागोया एशियाई खेलों में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के पिछले निराशाजनक प्रदर्शन से उबरने की उम्मीद लेकर उतरी थी। लेकिन जापान के नागोया में आयोजित प्रतियोगिता का समापन टीम के लिए केवल एक कांस्य पदक के साथ हुआ। यह नतीजा टीम की महत्वाकांक्षा और वास्तविक प्रदर्शन के बीच बड़े अंतर को दिखाता है।
टीम ने प्रतियोगिता से पहले एक स्वर्ण, एक रजत और छह कांस्य पदक जीतने का लक्ष्य रखा था। यानी कुल आठ पदकों की उम्मीद थी, जबकि हासिल हुआ पदक लक्ष्य का केवल एक हिस्सा रहा। कुश्ती जैसे खेल में हर भार-वर्ग का मुकाबला अलग होता है, इसलिए कई खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन की जरूरत होती है; इस बार दक्षिण कोरिया उस व्यापक सफलता तक नहीं पहुंच सका।
प्रतियोगिता के आखिरी दिन महिला पहलवान पार्क सो-यंग की हार के बाद दक्षिण कोरिया की कुश्ती टीम का अभियान समाप्त हुआ।
आखिरी मुकाबले में पार्क सो-यंग की हार
महिला फ्रीस्टाइल के ५३ किलोग्राम वर्ग में पार्क सो-यंग कांस्य पदक के मुकाबले में मंगोलिया की ओटगोंटुया बायानमुनख से ०-७ से हार गईं। फ्रीस्टाइल कुश्ती में खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंद्वी के पैरों पर भी हमला कर सकते हैं, इसलिए इसमें पकड़ और बचाव के साथ तेज़ी से दिशा बदलना भी अहम होता है। पार्क की हार के साथ ही प्रतियोगिता में दक्षिण कोरिया के सभी मुकाबले पूरे हो गए।
कांस्य पदक का मुकाबला उन खिलाड़ियों के लिए आखिरी मौका होता है जो फाइनल तक नहीं पहुंचे, लेकिन पदक जीतने की दौड़ में बने रहते हैं। इस चरण में हार का अर्थ है कि खिलाड़ी के लिए प्रतियोगिता में पदक जीतने का कोई और अवसर नहीं बचता। दक्षिण कोरिया के कई पहलवान इसी निर्णायक पड़ाव पर जीत दर्ज नहीं कर सके।
किम मिन-सोक का लगातार तीसरा कांस्य
टीम का एकमात्र पदक किम मिन-सोक ने जीता। उन्होंने पुरुषों के ग्रीको-रोमन कुश्ती के १३० किलोग्राम वर्ग में कांस्य हासिल किया। ग्रीको-रोमन शैली में पहलवान कमर के नीचे प्रतिद्वंद्वी को पकड़ या हमला नहीं कर सकते; इसलिए मुकाबले में शरीर के ऊपरी हिस्से पर नियंत्रण और संतुलन बनाए रखना खास तौर पर जरूरी होता है।
किम ने इस पदक के साथ लगातार तीन एशियाई खेलों में कांस्य जीतने का रिकॉर्ड बनाया। उन्होंने २०१८ जकार्ता-पालेमबांग और २०२२ हांगझोउ एशियाई खेलों में भी कांस्य पदक हासिल किया था। लगातार तीन प्रतियोगिताओं में पदक जीतना उनकी निरंतरता दिखाता है, हालांकि इस बार टीम की समग्र पदक संख्या बेहद कम रही।
पदक के करीब पहुंचकर भी जीत नहीं
दक्षिण कोरिया के चार अन्य पहलवान कांस्य पदक के मुकाबले तक पहुंचे, लेकिन जीत नहीं सके। महिला फ्रीस्टाइल के ६८ किलोग्राम वर्ग में पार्क ह्योन-यंग, पुरुषों के ग्रीको-रोमन ६० किलोग्राम वर्ग में किम दा-ह्योन और पुरुषों के फ्रीस्टाइल ८६ किलोग्राम वर्ग में ली ग्योंग-योन भी पदक से चूक गए।
किसी टीम के लिए पदक मुकाबलों तक पहुंचना यह दिखाता है कि उसके खिलाड़ी अंतिम दौर के करीब पहुंचे। लेकिन कुश्ती में एक छोटी-सी गलती—जैसे पकड़ ढीली पड़ना या प्रतिद्वंद्वी को पलटने का मौका देना—नतीजा बदल सकती है। इन हारों ने दक्षिण कोरिया की पदक तालिका पर सीधा असर डाला।
स्वर्ण के दावेदार जंग हान-जे भी बाहर
सबसे निराशाजनक नतीजों में जंग हान-जे का बाहर होना शामिल रहा। वह पिछले साल विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के ६३ किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीत चुके थे और इस प्रतियोगिता में पुरुषों के ग्रीको-रोमन ६७ किलोग्राम वर्ग में उतरे। इस वर्ग को ओलंपिक में भी शामिल किया जाता है, इसलिए उनके प्रदर्शन पर खास ध्यान था।
क्वार्टर फाइनल में जंग कज़ाख़स्तान के मेइरजान शेर्माखानबेत से ४-५ से हार गए। वह मुकाबले में आगे निकलने की स्थिति में थे, लेकिन अंत में स्कोर पलट गया। कुश्ती में क्वार्टर फाइनल की हार अक्सर पदक की राह कठिन कर देती है, क्योंकि खिलाड़ी को फिर भी पदक के मौके तक पहुंचने के लिए आगे के परिणामों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
अलग-अलग शैलियां, अलग रणनीतियां
फ्रीस्टाइल और ग्रीको-रोमन, कुश्ती की दो प्रमुख शैलियां हैं। फ्रीस्टाइल में पैरों पर हमला करना और उन्हें पकड़ना नियमों के तहत मान्य है, जबकि ग्रीको-रोमन में कमर के नीचे पकड़ने की अनुमति नहीं होती। इसलिए एक शैली में सफल खिलाड़ी को दूसरी शैली की तकनीक और रणनीति अलग से सीखनी पड़ती है।
पिछली प्रतियोगिताओं से जुड़ी चिंता
दक्षिण कोरिया ने २०२२ हांगझोउ एशियाई खेलों में दो कांस्य पदक जीते थे। उससे पहले एशियाई खेलों में उसका आखिरी स्वर्ण २०१८ जकार्ता-पालेमबांग प्रतियोगिता में आया था, जहां जो ह्यो-चोल और र्यू हान-सू ने स्वर्ण पदक जीते थे। मौजूदा नतीजा बताता है कि टीम के लिए शीर्ष स्थानों पर लौटना अब भी चुनौती बना हुआ है।
कुश्ती में किसी देश की सफलता केवल एक बड़े खिलाड़ी के प्रदर्शन पर निर्भर नहीं करती। अलग-अलग भार-वर्गों में मजबूत खिलाड़ी तैयार करना, अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों का अनुभव जुटाना और दबाव में रणनीति पर टिके रहना भी जरूरी होता है। इस बार किम मिन-सोक की उपलब्धि उल्लेखनीय रही, लेकिन बाकी वर्गों में पदक जीतने की क्षमता बढ़ाना टीम के लिए अगली बड़ी जरूरत होगी।
आगे की राह
एक प्रतियोगिता का नतीजा अपने आप में यह नहीं बताता कि टीम की हर कमजोरी क्या थी। फिर भी, पदक मुकाबलों में लगातार हार और स्वर्ण पदक के प्रमुख दावेदार का क्वार्टर फाइनल से बाहर होना ऐसे संकेत हैं जिनकी समीक्षा की जा सकती है। खिलाड़ियों की तैयारी, मुकाबलों के अंतिम क्षणों में निर्णय और अलग-अलग कुश्ती शैलियों में गहराई जैसे पहलू भविष्य की योजना में अहम रहेंगे।
आने वाले अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में दक्षिण कोरिया के लिए लक्ष्य केवल पदक तालिका में संख्या बढ़ाना नहीं होगा। उसे ऐसे पहलवान तैयार करने होंगे जो शुरुआती दौर से लेकर निर्णायक मुकाबलों तक लगातार जीत सकें। इस एशियाई खेल में मिला एक कांस्य पदक टीम की निरंतरता का एक उदाहरण है, लेकिन देश की कुश्ती को वास्तविक वापसी के लिए इससे कहीं व्यापक सफलता हासिल करनी होगी।



















