प्रकाश से तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि नियंत्रित करने वाले प्रकाश-आनुवंशिकी अनुसंधान का नेतृत्व करने वाले कार्ल डाइसरॉथ, पीटर हेगेमान और जॉर्ज नागेल को 2026 के नोबेल शरीरक्रिया विज्ञान या चिकित्सा पुरस्कार के विजेता चुना गया। प्रकाश-आनुवंशिकी वह तकनीक है जिसमें तंत्रिका कोशिकाओं में प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करने वाले प्रोटीन व्यक्त कराए जाते हैं और फिर उन पर प्रकाश डालकर तंत्रिका संकेतों को सक्रिय या दबाया जाता है। इससे शोधकर्ता तंत्रिका कोशिकाओं के कामकाज को मिलीसेकंड के पैमाने पर नियंत्रित कर सकते हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
मस्तिष्क अनुसंधान की चुनौती उसके आकार और जटिलता में है। मस्तिष्क के ऊतक के 1 घन मिलीमीटर जितने हिस्से में—जो खसखस के एक दाने जितना होता है—भी हजारों न्यूरॉन (तंत्रिका कोशिकाएँ) और अन्य सहायक कोशिकाएँ होती हैं, और ये एक-दूसरे के कार्य को प्रभावित करती हैं। इस जटिलता को समझने के लिए तंत्रिका-विज्ञान की तकनीकें मोटे तौर पर मस्तिष्क को दृश्य बनाने, उसके कार्य को मापने और फिर उसकी गतिविधि को नियंत्रित करने के क्रम में विकसित हुई हैं।
मस्तिष्क को दृश्य बनाने की शुरुआत के महत्वपूर्ण उदाहरणों में 1800 के दशक के उत्तरार्ध में स्पेनिश तंत्रिका-विज्ञानी और चित्रकार सैंटियागो रामोन ई काखाल के अवलोकन शामिल हैं। उन्होंने कैमिलो गोल्जी द्वारा विकसित सिल्वर स्टेनिंग विधि से मस्तिष्क के ऊतक में अलग-अलग न्यूरॉन को दिखाया, फिर उन्हें माइक्रोस्कोप से देखा और उनके चित्र बनाए। काखाल और गोल्जी को इस शोध के लिए 1906 का नोबेल शरीरक्रिया विज्ञान या चिकित्सा पुरस्कार मिला। 1970 के दशक में विकसित अग्रगामी और प्रतिगामी ट्रेसिंग विधियों का उपयोग न्यूरॉन के बीच विभिन्न मार्गों का मानचित्र बनाने में होता है।
आज इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से परमाणु-स्तर के रिज़ॉल्यूशन वाली छवियाँ बनाई जाती हैं, जबकि एक्सपैंशन माइक्रोस्कोपी से ऊतक के नमूनों को भौतिक रूप से बड़ा करके कोशिकाओं और उनके बीच के संपर्कों का अध्ययन किया जा सकता है। ये विधियाँ कनेक्टोमिक्स अनुसंधान से जुड़ी हैं, जिसमें न्यूरॉन के बीच सभी संपर्कों का मानचित्र बनाया जाता है। कार्यात्मक MRI (रक्त-प्रवाह में बदलाव के जरिए मस्तिष्क की गतिविधि देखने की इमेजिंग तकनीक) पूरे मस्तिष्क में रक्त-प्रवाह को मापकर गतिविधि का गैर-आक्रामक ढंग से अध्ययन करता है। इस तकनीक को संभव बनाने वाले तेज़ इमेजिंग अनुक्रमों और स्थानिक एन्कोडिंग विधियों के विकास का संबंध 2003 के नोबेल शरीरक्रिया विज्ञान या चिकित्सा पुरस्कार से है।
केवल संरचना देखने से यह जानना कठिन है कि तंत्रिका कोशिकाएँ एक-दूसरे को संकेत कैसे भेजती हैं। एलन हॉजकिन और एंड्रयू हक्सले को न्यूरॉन द्वारा उत्पन्न विद्युत संकेतों को पकड़ने और मापने के उनके शोध के लिए 1963 का नोबेल शरीरक्रिया विज्ञान या चिकित्सा पुरस्कार मिला। आज अनुसंधान में इस्तेमाल होने वाली प्रोब मस्तिष्क के कई क्षेत्रों में सैकड़ों न्यूरॉन की विद्युत गतिविधि एक साथ दर्ज कर सकती हैं। 2025 में प्रकाशित कई अध्ययनों में बताया गया कि जानवरों के निर्णय लेने के दौरान मस्तिष्क का 95% हिस्सा उस प्रक्रिया में शामिल दिखाई दिया। इससे संकेत मिलता है कि निर्णय लेने को केवल किसी एक मस्तिष्क क्षेत्र की क्रिया के रूप में समझाना कठिन है।
मस्तिष्क की गतिविधि नियंत्रित करने वाली तकनीकें भी विकसित हुई हैं। फ्रांसीसी न्यूरोसर्जन अलीम-लुई बेनाबिद ने 1980 के दशक के उत्तरार्ध में पार्किंसन रोग के लक्षणों को कम करने के लिए डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन विकसित किया। इस विधि में मस्तिष्क में इलेक्ट्रोड प्रत्यारोपित करके विद्युत उत्तेजना दी जाती है, लेकिन इससे इलेक्ट्रोड के आसपास की सभी कोशिकाएँ प्रभावित होती हैं; इसलिए केवल विशिष्ट न्यूरॉन को निशाना बनाने की इसकी क्षमता सीमित है। इसके विपरीत, प्रकाश-आनुवंशिकी में प्रकाश के जरिए लक्षित तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि नियंत्रित की जा सकती है। इससे शोधकर्ताओं को किसी विशिष्ट परिपथ के कामकाज और व्यवहार के बीच संबंध का अधिक सीधे अध्ययन करने की संभावना मिली है।
इस खबर का महत्व
प्रकाश-आनुवंशिकी का महत्व इस बात में है कि इससे केवल मस्तिष्क की गतिविधि का अवलोकन ही नहीं, बल्कि विशिष्ट तंत्रिका कोशिकाओं के कामकाज को नियंत्रित करके उसके परिणामों का अध्ययन भी किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी शोध का उद्देश्य यह पता लगाना हो कि कौन-सा तंत्रिका परिपथ दर्द की प्रतिक्रिया में शामिल है, तो उस परिपथ की गतिविधि को प्रकाश से नियंत्रित करके प्रतिक्रिया में बदलाव देखा जा सकता है। यह एक काल्पनिक उदाहरण है; इसका मतलब यह नहीं कि इस तकनीक का इस्तेमाल जल्द ही मरीजों के उपचार में होने लगेगा।
खबरों में प्रकाश-आनुवंशिकी के संभावित चिकित्सकीय उपयोगों के रूप में दृष्टि बहाल करने, दर्द कम करने और मिर्गी तथा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों के उपचार का ज़िक्र है। एक खबर में यह भी बताया गया है कि रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा के कारण दृष्टि खो चुके लोगों की आँखों में प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करने वाले प्रोटीन डालकर दृष्टि बहाल करने के लिए नैदानिक परीक्षण चल रहा है। एक अन्य खबर में बताया गया है कि प्रकाश-आनुवंशिकी का इस्तेमाल मस्तिष्क के अलावा हृदय और आँतों जैसे अन्य अंगों की कोशिकाओं तथा तंत्रिका तंत्र के बीच परस्पर क्रिया का अध्ययन करने में भी होता है।
हालाँकि, संभावनाओं और स्थापित उपचारों के बीच अंतर करना चाहिए। किसी बीमारी में इसका उपयोग किस हद तक किया जा सकता है, मरीजों पर इसका इस्तेमाल कब हो सकता है और इसकी सुरक्षा का मूल्यांकन कैसे किया जा रहा है—इन बातों का विस्तृत विवरण दी गई खबरों के आधार पर उपलब्ध नहीं है। नोबेल पुरस्कार से अनुसंधान का महत्व पता चलता है, लेकिन इससे अपने-आप यह साबित नहीं होता कि किसी विशिष्ट उपचार की प्रभावकारिता या सुरक्षा स्थापित हो चुकी है।
खबरों में अलग-अलग ढंग से पेश की गई बातें
विजेताओं के नामों पर खबरों में सहमति है, लेकिन उनकी उम्र अलग-अलग बताई गई है। एक खबर में डाइसरॉथ की उम्र 54 वर्ष और हेगेमान की 71 वर्ष बताई गई, जबकि दूसरी में क्रमशः 55 और 72 वर्ष। नागेल की उम्र सभी खबरों में 73 वर्ष बताई गई।
नैदानिक उपयोग के वर्णन में भी अंतर है। एक खबर में रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा के मरीजों की दृष्टि बहाल करने के लिए नैदानिक परीक्षण का ज़िक्र है, जबकि दूसरी में कहा गया है कि इसका उपयोग दृष्टि बहाल करने के लिए किया जाता है। इसलिए, केवल इन सामग्रियों के आधार पर उस उपचार के मौजूदा उपयोग का दायरा, नैदानिक परीक्षण का चरण या मरीजों को उपचार दिए जाने की वास्तविक शर्तें तय करना कठिन है।
पुष्ट तथ्य और जिन बातों का अभी पता नहीं है
पुष्ट तथ्य
- प्रकाश-आनुवंशिकी प्रकाश के जरिए तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि नियंत्रित करती है और मिलीसेकंड के पैमाने पर नियंत्रण संभव बनाती है।
- खबरों में बताया गया कि कार्ल डाइसरॉथ, पीटर हेगेमान और जॉर्ज नागेल 2026 के नोबेल शरीरक्रिया विज्ञान या चिकित्सा पुरस्कार के विजेता हैं।
- मस्तिष्क अनुसंधान की तकनीकें दृश्यांकन, कार्य के मापन और गतिविधि के नियंत्रण तक विकसित हुई हैं।
- खबरों में प्रकाश-आनुवंशिकी के संभावित उपयोगों में दृष्टि बहाल करने और दर्द, मिर्गी तथा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों के उपचार का ज़िक्र किया गया।
जिन बातों का अभी पता नहीं है
- प्रकाश-आनुवंशिकी पर आधारित उपचार वास्तविक मरीजों पर कब और किस दायरे में लागू होंगे।
- ऐसे उपचारों की सुरक्षा और प्रभावकारिता का मूल्यांकन किन प्रमाणों और प्रक्रियाओं के आधार पर किया जा रहा है।
- रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा से जुड़े नैदानिक परीक्षण का विशिष्ट चरण और उसमें भाग लेने की शर्तें।
पाठकों के लिए जाँचने योग्य बातें
- प्रकाश-आनुवंशिकी उपचार से जुड़ी खबर पढ़ते समय यह समझना ज़रूरी है कि बात अनुसंधान की संभावना की है, नैदानिक परीक्षण की है या वास्तविक उपचार में इसके इस्तेमाल की।
- नैदानिक परीक्षण की जानकारी का आकलन केवल बीमारी के नाम से न करें; उसमें भाग लेने की शर्तें और सुरक्षा मूल्यांकन का विवरण भी देखें।
- उपचार पर विचार करते समय केवल खबरों के आधार पर उसकी प्रभावकारिता का निष्कर्ष न निकालें। संबंधित बीमारी का उपचार करने वाले चिकित्सक से मौजूदा उपलब्ध विकल्पों और उनके प्रमाणों के बारे में जानकारी लेना महत्वपूर्ण है।
संदर्भ
- संदर्भित अन्य रिपोर्ट: koreatimes.co.kr
- संदर्भित अन्य रिपोर्ट: hani.co.kr




















