2026 आइची-नागोया एशियाई खेलों के पुरुष फुटबॉल फ़ाइनल में 1-0 से जीत के बाद, राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों के सैन्य सेवा लाभों से जुड़े बयानों और तस्वीरों पर विवाद हुआ। कप्तान ली गिह्योक ने साक्षात्कार में स्वर्ण पदक उठाकर कहा, “मैं सेना में नहीं जाऊंगा।” सबसे कम उम्र के खिलाड़ी पाक सŭंगसु ने ‘सेवा-मुक्ति टोपी’ पहने हुए अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की, फिर उसे हटा दिया। फ़ाइनल में निर्णायक गोल में सहायता करने वाले यांग मिनह्योक के उस बयान की भी आलोचना हुई, जिसमें उन्होंने सैन्य सेवा लाभ को पुरस्कार के तौर पर ज़िक्र किया था। तीनों खिलाड़ियों ने 4 अक्टूबर को माफ़ीनामा पोस्ट किया या अपने बयानों का आशय समझाया।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
उन्होंने यह भी कहा कि स्वर्ण पदक ने उनके कंधों से एक भारी बोझ उतार दिया, इसलिए यह उनके लिए बहुत मायने रखता है। यह बात जीत की खुशी और भर्ती होने वाले खिलाड़ी के दबाव—दोनों को एक साथ व्यक्त करती थी, लेकिन साक्षात्कार में “मैं सेना में नहीं जाऊंगा” कहने को दूसरे अर्थ में लिया गया।
मैच के तुरंत बाद पाक सŭंगसु ने लॉकर रूम में स्वर्ण पदक पहनकर ‘सेवा-मुक्ति टोपी’ लगाए हुए अपनी तस्वीर पोस्ट की। सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी आया, जिसमें वह वही टोपी पहने दर्शकों की ओर मुस्कराते हुए सलाम कर रहे थे। अपने माफ़ीनामे में पाक ने बताया कि मैच के तुरंत बाद एक प्रशंसक ने उन्हें टोपी दी थी और उन्होंने उसके अर्थ पर पर्याप्त विचार किए बिना तस्वीर पोस्ट कर दी।
मैच के बाद एक साक्षात्कार में यांग मिनह्योक ने कथित तौर पर कुछ इस आशय का जवाब दिया कि ऐसा लगता है, मानो उन्होंने केवल सैन्य सेवा लाभ के पुरस्कार को ध्यान में रखकर मैच खेला हो। बाद में उन्होंने कहा कि उनकी बात का आशय यह था कि सैन्य सेवा लाभ जीत के लिए उनके पास मौजूद कई प्रेरणाओं में से एक था, लेकिन उसे गलत ढंग से पेश किया गया। ये तीनों घटनाएं दिखाती हैं कि किसी खिलाड़ी के शब्द और तस्वीरें, उसके इरादे से अलग होकर भी सार्वजनिक अर्थ ग्रहण कर सकते हैं। राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ी के बयान पर इसलिए भी ध्यान दिया जाता है कि वह निजी खुशी व्यक्त करने के साथ-साथ ऐसी जगह पर होता है, जहां उसे यह भी सोचना पड़ता है कि देश की रक्षा का दायित्व निभाने वाले लोग और समर्थन करने वाले प्रशंसक उसकी बात को कैसे समझेंगे।
इस खबर का अर्थ
आलोचना का मुख्य मुद्दा स्वर्ण पदक जीतकर खुशी मनाना नहीं, बल्कि यह है कि सैन्य सेवा लाभ को जीत का पुरस्कार बताना या ‘सेवा-मुक्ति टोपी’ पहनना उन लोगों के प्रति बेपरवाही जैसा लग सकता है जो देश की रक्षा का दायित्व निभाते हैं। पीपल पावर पार्टी (국민의힘) के सांसद आन चोल-सू ने 4 अक्टूबर को सवाल उठाया कि क्या भर्ती होने वाले युवा ‘मूर्ख’ हैं, खिलाड़ियों के रवैये की आलोचना की और सैन्य सेवा से छूट के लाभ पर फिर से विचार करने की मांग की। यह सांसद का दावा है; केवल खबर में दी गई जानकारी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि व्यवस्था में बदलाव हुआ है या खिलाड़ियों के खिलाफ कोई अलग कार्रवाई की गई है।
खिलाड़ियों की माफ़ी का केंद्र भी अलग-अलग था। ली गिह्योक ने कहा कि उन्होंने देश की रक्षा का दायित्व निभाने वाले लोगों और उनका समर्थन करने वाले प्रशंसकों को ठेस पहुंचाई। पाक सŭंगसु ने स्पष्ट किया कि उनका किसी का मज़ाक उड़ाने का इरादा नहीं था और टोपी के अर्थ पर गहराई से विचार न करने के लिए माफ़ी मांगी। यांग मिनह्योक ने समझाया कि उनकी बात का आशय यह था कि सैन्य सेवा लाभ कई प्रेरणाओं में से एक था, लेकिन उसे गलत ढंग से पेश किया गया। यह ज़रूरी है कि इरादा न होने के स्पष्टीकरण और अभिव्यक्ति से पड़े प्रभाव को अलग-अलग देखा जाए।
उदाहरण के लिए, अगर राष्ट्रीय टीम का कोई खिलाड़ी जीत के तुरंत बाद सैन्य सेवा लाभ का ज़िक्र करे, तो भले ही उसका इरादा तनाव और दबाव से मुक्त होने की खुशी व्यक्त करना हो, सुनने वाले इसे उन लोगों के प्रयासों को हल्के में लेने के रूप में समझ सकते हैं जिन्हें सैन्य सेवा करनी ही होती है। इस मामले में जिस बात की पुष्टि होती है, वह ऐसी व्याख्या को लेकर हुई आलोचना और खिलाड़ियों की माफ़ी है। इसे सभी प्रशंसकों या नागरिकों की एक जैसी राय नहीं माना जा सकता।
संबंधित व्यवस्था और सहायता की जानकारी
लेख के अनुसार, एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ी सक्रिय सैन्य सेवा करने के बजाय कला एवं खेल कर्मी (예술·체육요원) के रूप में सेवा करते हैं। लेख में कला एवं खेल कर्मी को वैकल्पिक सेवा का नाम बताया गया है। इन खिलाड़ियों को 34 महीनों में 544 घंटे की सार्वजनिक सेवा करनी होती है। इसलिए, आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले ‘सैन्य सेवा से छूट’ वाले शब्दों से यह समझना कि सैन्य सेवा का दायित्व पूरी तरह समाप्त हो जाता है, लेख में बताई गई व्यवस्था से मेल नहीं खाएगा।
इस अंतर को समझना विवाद को पढ़ते समय भी अहम है। खिलाड़ियों पर लागू व्यवस्था में सक्रिय सैन्य सेवा के बजाय तय अवधि और घंटों की सार्वजनिक सेवा शामिल है। इस लेख में दी गई जानकारी से किसी व्यक्ति की सेवा पूरी करने की स्थिति या अतिरिक्त शर्तों के बारे में पता नहीं चलता। सांसद आन चोल-सू की ‘लाभ पर फिर से विचार’ करने की मांग को एक राजनेता की आपत्ति के तौर पर रिपोर्ट किया गया है; खबर में ऐसा कुछ नहीं कहा गया कि स्वर्ण पदक विजेताओं पर लागू व्यवस्था बदल गई है।
अलग-अलग खबरों में अलग ढंग से पेश की गई बातें
दोनों खबरों में यह बात समान रूप से बताई गई कि खिलाड़ियों के बयान, तस्वीरें और माफ़ी विवाद के केंद्र में थे। हालांकि, यांग मिनह्योक के बयान को पेश करने के तरीके में अंतर है। एक खबर ने इसे इस आशय से पेश किया कि ऐसा लगता है मानो उन्होंने सिर्फ़ सैन्य सेवा से छूट के पुरस्कार के लिए मैच खेला हो; दूसरी खबर ने इसे इस आशय से लिखा कि पदक और जीत मायने नहीं रखते थे और उन्होंने सिर्फ़ सैन्य सेवा से छूट पर ध्यान दिया था। यांग मिनह्योक ने बाद में माफ़ी मांगते हुए कहा कि उनकी बात का आशय—सैन्य सेवा लाभ कई प्रेरणाओं में से एक था—गलत ढंग से पेश किया गया। इसलिए खबरों में दिए गए शब्दों के अंतर और उनके बाद के स्पष्टीकरण, दोनों को साथ देखना चाहिए।
एक अन्य खबर में सांसद आन चोल-सू का यह दावा भी जोड़ा गया कि खिलाड़ियों ने अभ्यास के दौरान ‘सिपाही की चिट्ठी’ गीत चलाया था। साथ ही, टीम की लगातार चौथी बार प्रतियोगिता जीतने और सैन्य सेवा में विशेष छूट के दायरे में आने वाले खिलाड़ियों की संख्या से जुड़ी जानकारी भी दी गई। यह जानकारी दूसरी खबर में नहीं थी। खास तौर पर अभ्यास से जुड़ी बात सांसद के बयान के रूप में रिपोर्ट किया गया दावा है, न कि ऐसा तथ्य जिसे दोनों खबरों ने मिलकर पुष्ट किया हो।
पुष्ट तथ्य और अब भी अज्ञात बातें
पुष्ट तथ्य
- राष्ट्रीय टीम ने फ़ाइनल 1-0 से जीता और मैच के बाद ली गिह्योक ने साक्षात्कार में कहा, “मैं सेना में नहीं जाऊंगा।”
- पाक सŭंगसु ने स्वर्ण पदक पहनकर ‘सेवा-मुक्ति टोपी’ लगाए हुए अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की और फिर हटा दी; इससे जुड़ा वीडियो भी ऑनलाइन पोस्ट किया गया।
- यांग मिनह्योक के सैन्य सेवा लाभों का ज़िक्र करने वाले बयान की खबर आने के बाद उन्होंने माफ़ी मांगी और कहा कि उनकी बात का आशय गलत ढंग से पेश किया गया।
- ली गिह्योक, पाक सŭंगसु और यांग मिनह्योक ने 4 अक्टूबर को अलग-अलग माफ़ी मांगी या स्पष्टीकरण दिया।
- लेख के अनुसार, स्वर्ण पदक विजेता सक्रिय सैन्य सेवा के बजाय कला एवं खेल कर्मी (예술·체육요원) के रूप में 34 महीनों में 544 घंटे की सार्वजनिक सेवा करते हैं।
अब भी अज्ञात बातें
- खबरों में यह नहीं बताया गया कि राष्ट्रीय टीम या फुटबॉल संघ ने बयानों और तस्वीरों को लेकर कोई अलग कार्रवाई की या नहीं।
- यह पुष्टि नहीं है कि माफ़ी के बाद खिलाड़ियों और आलोचना करने वालों के बीच विवाद किस तरह आगे बढ़ा।
- सांसद की सैन्य सेवा लाभों पर फिर से विचार करने की मांग से वास्तव में व्यवस्था की समीक्षा शुरू हुई या नहीं, यह इन खबरों के आधार पर पता नहीं चलता।
पाठकों को किन बातों की जांच करनी चाहिए
- ‘सैन्य सेवा से छूट’ वाला शब्द देखते समय यह अंतर समझना ज़रूरी है कि सक्रिय सैन्य सेवा नहीं करनी होती और सैन्य सेवा का दायित्व पूरी तरह समाप्त हो जाता है। इस लेख में स्वर्ण पदक विजेताओं के लिए बताई गई व्यवस्था कला एवं खेल कर्मी के रूप में सेवा है।
- राजनेता की व्यवस्था बदलने की मांग और व्यवस्था में वास्तव में तय हुए बदलाव को अलग-अलग देखें। इस खबर में लाभों पर फिर से विचार करने की मांग का ज़िक्र है, लेकिन यह नहीं कहा गया कि बदलाव तय हो गया है।
- विवाद के बारे में पढ़ते समय बयान के मूल शब्दों, खिलाड़ी के बाद में दिए गए स्पष्टीकरण और तस्वीर पोस्ट किए जाने के संदर्भ—तीनों की जांच करने से इरादे को लेकर किए गए दावों और जनता पर पड़े प्रभाव को आपस में गड्ड-मड्ड करने से बचने में मदद मिलती है।
संदर्भ
- संदर्भित अन्य रिपोर्ट: chosun.com




















