संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बान की-मून ने कहा कि उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच बातचीत फिर शुरू होने पर भी लक्ष्य उत्तर कोरिया का पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल विकास को रोकने को उस पर लगाए गए प्रतिबंधों से सीधे जोड़ना जोखिम भरा है। उन्होंने प्रतिबंध और दबाव जारी रखने तथा उत्तर कोरिया में मानवाधिकारों के मुद्दे को भी उठाने की वकालत की। उन्होंने यह बात पिछले महीने की 29 तारीख को कोरिया विश्वविद्यालय (고려대학교) में आयोजित एक संगोष्ठी के उद्घाटन भाषण में कही।
इस बहस की पृष्ठभूमि में राष्ट्रपति ली जे-म्योंग का न्यूयॉर्क टाइम्स को दिया गया साक्षात्कार है। रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ली ने कहा कि प्रभावशीलता कम होने के बावजूद उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों के बदले अतिरिक्त परमाणु हथियारों और अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM—महाद्वीपों के पार उड़ने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें) की तकनीक का विकास रोकना मूल्यवान होगा। बान की-मून ने इस विचार का विरोध करते हुए कहा कि प्रतिबंधों को परमाणु और मिसाइल विकास रोकने से सीधे जोड़ना जोखिम भरा है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
संगोष्ठी का संयुक्त आयोजन बेहतर भविष्य के लिए बान की-मून फाउंडेशन (보다 나은 미래를 위한 반기문재단) और कोरिया विश्वविद्यालय के एकीकरण एवं अभिसरण अध्ययन संस्थान (고려대 통일융합연구원) ने किया था। इसका विषय था ‘व्यवस्था के बाद की व्यवस्था—अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का पुनर्गठन और कोरियाई प्रायद्वीप में शांति’। बान की-मून ने कोरियाई प्रायद्वीप के मुद्दे पर बात करते हुए उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच बातचीत फिर शुरू होने की संभावना और उस स्थिति में तय किए जाने वाले लक्ष्यों का उल्लेख किया।
उन्होंने लक्ष्य के रूप में उत्तर कोरिया का पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण (CVID) बताया। बान की-मून ने कहा कि निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया में होने वाले समझौतों का आकलन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि क्या वे सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि दक्षिण कोरिया और पूरे पूर्वोत्तर एशिया के लिए खतरे को वास्तविक रूप से कम करते हैं। इसके बाद उन्होंने परमाणु और मिसाइल विकास रोकने को प्रतिबंधों से सीधे जोड़ने की व्यवस्था पर चिंता जताई।
बान की-मून ने इस आकलन से भी असहमति जताई कि उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंध प्रभावी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों का असर स्पष्ट है और उत्तर कोरिया का 95% व्यापार चीन पर निर्भर है, यह भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रतिबंधों के कारण है। यह प्रतिबंधों के प्रभाव को लेकर बान की-मून की दी हुई व्याख्या है; केवल इस बयान से यह कारण-संबंध साबित नहीं होता कि प्रतिबंध परमाणु और मिसाइल विकास को रोकते हैं।
जिस बात को लेकर उन्हें खास चिंता थी, वह यह कि प्रतिबंध हटाने के बाद क्या उन्हें फिर से लगाया जा सकता है। बान की-मून ने कहा कि अगर उत्तर कोरिया निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया से पीछे हटता है, तो मौजूदा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना के तहत प्रतिबंधों को दोबारा लागू करना लगभग असंभव हो सकता है। इसलिए उनकी दलील को इस चेतावनी के रूप में समझा जा सकता है कि सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि प्रतिबंधों को बातचीत के एक साधन के रूप में इस्तेमाल करना सही है या नहीं, बल्कि यह भी विचार करना चाहिए कि एक बार हटाए गए प्रतिबंधों को फिर से लागू किया जा सकेगा या नहीं।
इस खबर का अर्थ
यह बयान उत्तर कोरिया नीति से जुड़े दो परस्पर संबंधित मुद्दों को सामने लाता है। पहला, क्या बातचीत का लक्ष्य पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण ही रखा जाए; दूसरा, क्या उत्तर कोरिया के अतिरिक्त परमाणु हथियारों और ICBM तकनीक का विकास रोकने के बदले प्रतिबंध हटाए जा सकते हैं। राष्ट्रपति ली के साक्षात्कार में इस तरह के आदान-प्रदान के महत्व का उल्लेख था, जबकि बान की-मून ने इस कड़ी को जोखिम भरा माना। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर यह नहीं जाना जा सकता कि इनमें से कौन-सा विचार सरकार की तय नीति है।
मसलन, मान लीजिए कि उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच बातचीत फिर शुरू होती है और अतिरिक्त परमाणु हथियारों तथा ICBM तकनीक का विकास रोकने के बदले प्रतिबंधों में ढील देने का प्रस्ताव बातचीत की मेज पर आता है। ऐसे में बहस इस बात पर केंद्रित हो सकती है कि प्रतिबंधों में ढील के बदले मिलने वाले रोक संबंधी कदमों का क्या महत्व है और निरस्त्रीकरण के अंतिम लक्ष्य को कैसे कायम रखा जाए। बान की-मून की चिंता के मुताबिक, यह बात भी फैसले का हिस्सा होगी कि प्रतिबंध हटाने के बाद यदि उत्तर कोरिया निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया से पीछे हटता है, तो उस पर फिर से प्रतिबंध लगाना मुश्किल हो सकता है।
यह मुद्दा उत्तर कोरिया के प्रति सरकार की नीति की दिशा पर नजर रखने वाले नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण है। ‘क्या प्रतिबंध प्रभावी हैं?’ और ‘प्रतिबंधों में किन शर्तों पर बदलाव किया जाए?’—ये जुड़े हुए सवाल हैं, लेकिन एक ही सवाल नहीं। प्रतिबंधों के प्रभाव को कम आंकने का मतलब यह नहीं कि कोई खास लेन-देन की व्यवस्था अपने-आप तय हो गई है। इसी तरह, केवल राष्ट्रपति के साक्षात्कार में कही गई बात से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सरकार इसे वास्तव में लागू करने जा रही है।
रिपोर्टों में अलग-अलग ढंग से पेश की गई बातें
मूल रिपोर्ट एक ही है, इसलिए एक ही मामले पर अलग-अलग रिपोर्टिंग की तुलना करने का आधार नहीं है। हालांकि, लेख में राष्ट्रपति ली के साक्षात्कार की टिप्पणी और बान की-मून की प्रतिक्रिया, दोनों शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, बान की-मून ने प्रतिबंधों के प्रभाव और उन्हें फिर से लागू करने की संभावना पर जोर दिया, जबकि राष्ट्रपति ली ने कहा कि प्रतिबंधों के बदले अतिरिक्त परमाणु हथियारों और ICBM तकनीक का विकास रोकना मूल्यवान होगा।
पुष्ट तथ्य और वे बातें जो अभी अज्ञात हैं
पुष्ट तथ्य
- बान की-मून ने पिछले महीने की 29 तारीख को कोरिया विश्वविद्यालय के शताब्दी स्मारक सैमसंग हॉल (백주년기념삼성관) में आयोजित चौथी संगोष्ठी में उद्घाटन भाषण दिया।
- संगोष्ठी का संयुक्त आयोजन बेहतर भविष्य के लिए बान की-मून फाउंडेशन और कोरिया विश्वविद्यालय के एकीकरण एवं अभिसरण अध्ययन संस्थान ने किया था। इसका विषय अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का पुनर्गठन और कोरियाई प्रायद्वीप में शांति था।
- बान की-मून ने कहा कि उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच बातचीत फिर शुरू होने पर भी लक्ष्य उत्तर कोरिया का पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण होना चाहिए।
- उन्होंने परमाणु और मिसाइल विकास रोकने को प्रतिबंधों से सीधे जोड़ने का विरोध किया और प्रतिबंध व दबाव जारी रखने तथा उत्तर कोरिया में मानवाधिकारों के मुद्दे का उल्लेख किया।
- रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजदूत किम सुक ने 1 तारीख को एक समाचार-पत्र के विचार-लेख में राष्ट्रपति ली के उत्तर कोरिया संबंधी दृष्टिकोण की आलोचना की।
वे बातें जो अभी अज्ञात हैं
- मूल रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि राष्ट्रपति ली जे-म्योंग या सरकार ने बान की-मून और संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजदूत किम सुक की आलोचनाओं पर क्या रुख अपनाया।
- यह भी पुष्टि नहीं हुई है कि सरकार प्रतिबंधों को परमाणु और मिसाइल विकास रोकने से जोड़ने की व्यवस्था को वास्तविक नीति के रूप में आगे बढ़ाने की योजना बना रही है या नहीं।
- यह भी ज्ञात नहीं है कि भविष्य की बातचीत में प्रतिबंधों में ढील और विकास रोकने को ठोस वार्ता-शर्तों के रूप में रखा जाएगा या नहीं।
पाठक किन बातों की पुष्टि करें
- आगे की घोषणाओं पर नजर रखते समय राष्ट्रपति के साक्षात्कार में कही गई बातों और सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से अपनाई गई नीति के बीच अंतर करना जरूरी है।
- यह देखा जा सकता है कि क्या सरकार प्रतिबंधों को विकास रोकने से जोड़ने की बात कहती है; और यदि कहती है, तो वह किन शर्तों और लक्ष्यों का उल्लेख करती है।
- उत्तर कोरिया से भविष्य की बातचीत संबंधी घोषणाओं में ‘पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण’ और ‘परमाणु हथियारों से मुक्त कोरियाई प्रायद्वीप’ जैसे लक्ष्य किस तरह व्यक्त किए जाते हैं, इसकी तुलना भी की जा सकती है।




















