अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के रूढ़िवादी विचारों वाले न्यायाधीश सैमुअल एलिटो ने अदालत और उसके न्यायाधीशों के खिलाफ सार्वजनिक बयानों के तीखे होते जाने पर चिंता जताई। एलिटो ने 4 तारीख (स्थानीय समय) को फॉक्स न्यूज़ के एक साक्षात्कार में कहा कि उन्हें चिंता है कि इन बयानों का सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा पर लंबे समय तक असर पड़ेगा। यह बयान ट्रंप प्रशासन की प्रमुख नीतियों पर रोक लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और उन फैसलों की बहुमत की राय में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा नियुक्त न्यायाधीशों के शामिल होने को लेकर हुई आलोचना के जवाब में आया।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में नील गोरसच, ब्रेट कैवनॉ और एमी कोनी बैरेट सहित 3 न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया था। खबरों के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स और एलिटो तथा क्लेरेंस थॉमस को मिलाकर सुप्रीम कोर्ट के 9 न्यायाधीशों में से 6 को रूढ़िवादी विचारों वाला माना जाता है। हालांकि, खबर में कहा गया कि इस साल सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में पारस्परिक शुल्कों को गैरकानूनी ठहराने, जून में जन्म से नागरिकता को मान्यता देने और सितंबर में डाक से मतदान पर रोक लगाने की अनुमति न देने जैसे मामलों में राष्ट्रपति ट्रंप की इच्छा से अलग फैसले दिए।
इन फैसलों को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप ने उन न्यायाधीशों की सार्वजनिक रूप से आलोचना की जिन्हें उन्होंने खुद नियुक्त किया था। पिछले महीने उन्होंने ट्रुथ सोशल पर अपने द्वारा नियुक्त 3 न्यायाधीशों को निशाना बनाया, और हाल ही में टाइम पत्रिका को दिए साक्षात्कार में कहा कि उन्हें उनकी नियुक्ति करने का पछतावा है। हालांकि, डाक से मतदान पर रोक लगाने के मुकदमे में उनका पक्ष लेने वाले थॉमस और एलिटो के बारे में उन्होंने कहा, “दोनों दिग्गज हैं।” फैसले के नतीजे के आधार पर उन्हीं न्यायाधीशों की आलोचना या प्रशंसा करना दिखाता है कि अदालत के फैसलों और राजनीतिक अपेक्षाओं के बीच टकराव किस तरह सामने आता है।
एलिटो ने कहा कि वह ऐसी बातों को अपने दिमाग से निकाल देते हैं और उन्हें भरोसा है कि उनके साथी न्यायाधीश भी ऐसा ही करते होंगे। हालांकि, किसी व्यक्ति के लिए आलोचना को अनदेखा कर पाना और ऐसी आलोचना का समय के साथ सुप्रीम कोर्ट की सामाजिक प्रतिष्ठा पर असर पड़ना—ये दो अलग-अलग सवाल हैं, और यही उनकी चिंता है। इस पर ध्यान देना इसलिए अहम है कि सुप्रीम कोर्ट का अधिकार केवल फैसले सुनाने की शक्ति से ही नहीं, बल्कि इस बात से भी जुड़ा है कि उसके निर्णयों को सार्वजनिक संस्थागत व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया जाता है।
एलिटो ने इस प्रवृत्ति की ओर भी ध्यान दिलाया कि राष्ट्रपति जब कांग्रेस को अपने विधायी एजेंडे के लिए राजी नहीं कर पाते, तो वे कार्यकारी आदेश जारी करके या कानूनों और नियमों की नई व्याख्या करके नीतियां आगे बढ़ाते हैं, और इसके खिलाफ मुकदमों तथा तात्कालिक आवेदनों की संख्या बढ़ती जाती है। उन्होंने कहा कि 2025 में महत्वपूर्ण दीवानी मामलों में तात्कालिक आवेदनों की संख्या 50 से अधिक थी और लगभग इसी अवधि में मुख्य सुनवाई के लिए आए मामलों की संख्या भी इसके करीब थी। तात्कालिक आवेदन उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें किसी मामले पर अंतिम फैसला आने से पहले अदालत से शीघ्र निर्णय मांगा जाता है। इससे पता चलता है कि जैसे-जैसे नीतियां आगे बढ़ती हैं और उनके खिलाफ कानूनी जवाबी कार्रवाई तेजी से होती है, वैसे-वैसे सुप्रीम कोर्ट के राजनीतिक मुद्दों से निपटने की आवृत्ति भी बढ़ सकती है।
इस खबर का अर्थ
यह बहस केवल राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के संबंधों से ही नहीं, बल्कि इस सवाल से भी जुड़ी है कि क्या न्यायाधीश राजनीतिक आलोचना के बीच भी मामलों पर स्वतंत्र रूप से फैसला कर सकते हैं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सिद्धांत कहता है कि अदालतों को राजनीतिक दबाव से प्रभावित हुए बिना मामलों पर निर्णय लेने में सक्षम होना चाहिए। एलिटो के बयान का आशय यह समझा जा सकता है कि भले ही कोई न्यायाधीश निजी तौर पर ऐसी बातों को अपने दिमाग से निकाल सके, लेकिन बार-बार होने वाले सार्वजनिक दबाव का पूरी अदालत के भरोसे और प्रतिष्ठा पर क्या असर पड़ता है, यह चिंता का विषय है।
इसका असर केवल न्यायाधीशों या राष्ट्रपति पर नहीं पड़ता। जिन लोगों के अधिकार या नीतियों का लागू होना सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से बदलता है, उनके लिए फैसले की विषयवस्तु के साथ यह बात भी अहम हो सकती है कि फैसला देने वाली संस्था राजनीतिक दबाव से मुक्त है या नहीं। इसके उलट, राष्ट्रपति की नीतियों का समर्थन करने वालों के लिए यह सवाल अहम हो सकता है कि निर्वाचित कार्यपालिका की नीतिगत पहल को अदालत के फैसले से सीमित किया जा रहा है या नहीं। यह किसी खास समूह की वास्तविक प्रतिक्रिया की पुष्टि नहीं है, बल्कि यह बताता है कि फैसले और राजनीतिक टकराव एक-दूसरे से जुड़ने पर किन हितों का सवाल उठ सकता है।
मिसाल के तौर पर, अगर किसी राष्ट्रपति की नीति पर सुप्रीम कोर्ट रोक लगा दे और उस फैसले को लेकर न्यायाधीशों की सार्वजनिक आलोचना होने लगे, तो पाठक नीति की वैधता के साथ यह भी देख सकते हैं कि क्या अदालत राजनीतिक दबाव के बावजूद लगातार एकसमान ढंग से फैसले कर सकती है। केवल इस काल्पनिक स्थिति के आधार पर किसी खास फैसले को सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता। अहम बात यह है कि फैसले की आलोचना और किसी न्यायाधीश को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाकर उस पर डाले जा रहे दबाव के बीच फर्क किया जाए।
एलिटो ने सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने और उनके कार्यकाल या उम्र की सीमाएं तय करने जैसी सुधार संबंधी मांगों पर भी चिंता जताई। उन्होंने इन्हें सुप्रीम कोर्ट और उसके न्यायाधीशों को प्रभावित करने की संगठित कोशिशें बताया और कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के भविष्य की चिंता है। हालांकि, इस बयान का यह अर्थ नहीं है कि यह साबित हो गया है कि सुधार की मांगें वास्तव में अदालत के फैसलों को बदलने का दबाव हैं; यह केवल बताता है कि एलिटो उन मांगों को किस तरह देखते हैं।
पुष्ट तथ्य और वे बातें जो अभी ज्ञात नहीं हैं
पुष्ट तथ्य
- एलिटो ने 4 तारीख (स्थानीय समय) को फॉक्स न्यूज़ के एक साक्षात्कार में सुप्रीम कोर्ट और उसके न्यायाधीशों के खिलाफ सार्वजनिक बयानों के तीखे होते जाने पर चिंता जताई।
- उन्होंने कहा कि उन्हें चिंता है कि उन बयानों का सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा पर लंबे समय तक असर पड़ेगा।
- राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में गोरसच, कैवनॉ और बैरेट सहित 3 न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया था।
- खबर में कहा गया कि इस साल सुप्रीम कोर्ट ने पारस्परिक शुल्कों, जन्म से नागरिकता और डाक से मतदान पर रोक से जुड़े फैसलों में राष्ट्रपति ट्रंप की इच्छा से अलग निर्णय दिए।
- एलिटो ने राष्ट्रपति की एकतरफा नीतिगत पहल के खिलाफ मुकदमों और तात्कालिक आवेदनों में बढ़ोतरी की प्रवृत्ति का उल्लेख किया।
वे बातें जो अभी ज्ञात नहीं हैं
- मूल सामग्री में यह नहीं बताया गया है कि एलिटो के साक्षात्कार में दिए बयान पर राष्ट्रपति ट्रंप की क्या प्रतिक्रिया थी।
- मूल सामग्री यह भी स्पष्ट नहीं करती कि एलिटो की चिंता के दायरे में कौन-कौन से विशिष्ट सार्वजनिक बयान आते हैं।
- उपलब्ध सामग्री से यह पुष्टि नहीं की जा सकती कि सार्वजनिक आलोचना ने वास्तव में न्यायाधीशों के फैसलों या सुप्रीम कोर्ट पर लोगों के भरोसे को बदला है या नहीं।
पाठक किन बातों की जांच कर सकते हैं
- सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को देखते समय फैसले के निष्कर्ष और बहुमत की राय में शामिल न्यायाधीशों को अलग-अलग पहचानकर देखा जा सकता है।
- राष्ट्रपति या राजनीतिक जगत की आलोचना पर ध्यान देते समय यह फर्क करना जरूरी है कि आलोचना फैसले के तर्क को लेकर है या किसी न्यायाधीश पर व्यक्तिगत दबाव बनाने के लिए।
- न्यायाधीशों की संख्या, कार्यकाल और उम्र की सीमा से जुड़ी चर्चाओं में एलिटो के आकलन और वास्तविक सुधार प्रस्तावों की विषयवस्तु को अलग-अलग समझना बेहतर है।




















