6 अक्टूबर 2026 को दक्षिण कोरिया के सर्वोच्च न्यायालय (대법원) के मुख्य न्यायाधीश चो ही-दाए ने संसद (국회) की विधायी एवं न्यायिक मामलों की समिति (법제사법위원회) में सर्वोच्च न्यायालय की सरकारी लेखा-परीक्षा के दौरान न्यायाधीश उम्मीदवार की सिफारिश को लेकर राष्ट्रपति कार्यालय (청와대) के साथ विवाद पर सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखा। मुख्य न्यायाधीश चो ने कहा, “संसद और राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश में बिल्कुल भी दखल नहीं दे सकते।” उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रपति के साथ पहले से परामर्श करना संविधान के तहत कोई अनिवार्य कर्तव्य नहीं, बल्कि नियुक्ति शीघ्र हो सके, इसके लिए स्वेच्छा से किया जाने वाला सहयोग रहा है। राष्ट्रपति कार्यालय फिर से सिफारिश करने की मांग कर रहा है, लेकिन लेख में अभी उम्मीदवार का भविष्य या विवाद का अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में मुख्य न्यायाधीश उम्मीदवार की सिफारिश करते हैं, राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं और संसद सहमति देने की प्रक्रिया संभालती है। इस विवाद का केंद्र यह है कि इस प्रक्रिया में राष्ट्रपति के नियुक्ति-अधिकार और मुख्य न्यायाधीश के सिफारिश-अधिकार के बीच क्या संबंध है, और क्या राष्ट्रपति के साथ पहले से परामर्श करने की मांग को महज़ परंपरा से आगे बढ़ाया जा सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति कार्यालय का कहना है कि मुख्य न्यायाधीश चो ने पहले से परामर्श किए बिना ताएगू जिला न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश सोन बोंग-गी को उम्मीदवार के रूप में नामित किया। उसने सिफारिश लौटा दी है और फिर से सिफारिश करने की मांग की है। मुख्य न्यायाधीश चो ने कहा कि फिर से सिफारिश करने की मांग वाले आधिकारिक पत्र में ठोस कारण और संवैधानिक आधार स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं थे। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में पत्र की पूरी सामग्री या दोनों पक्षों के सभी कानूनी तर्कों की जांच के लिए सामग्री शामिल नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश चो ने कहा कि राष्ट्रपति से पहले परामर्श न करने में संवैधानिक रूप से कोई समस्या नहीं है और पिछले राष्ट्रपतियों ने अंततः सिफारिश-अधिकार का सम्मान किया है। दूसरी ओर, डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने इस आशय का तर्क दिया कि सिफारिश-अधिकार राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में सहयोग देने वाला प्रक्रियात्मक अधिकार है, और उन्होंने फिर से सिफारिश करने की मांग की। दोनों पक्षों के रुख से पता चलता है कि वे एक ही नियुक्ति प्रक्रिया में सिफारिश और नियुक्ति के अधिकारों की सीमा की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं। केवल इन बयानों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि किसी एक पक्ष की व्याख्या अंतिम रूप से तय हो गई है।
संसदीय सुनवाई के दौरान अधिकारों को लेकर विवाद गवाह की शपथ और जवाब देने के मुद्दे तक भी पहुंचा। मुख्य न्यायाधीश चो ने यह कहते हुए शपथ लेने से इनकार कर दिया कि इससे शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचने की आशंका है। विधायी एवं न्यायिक मामलों की समिति की अध्यक्ष सॉ येओंग-ग्यो ने उन्हें जाने की अनुमति नहीं दी, इसलिए मुख्य न्यायाधीश चो सुनवाई कक्ष में रहे और सांसदों के सवालों के जवाब दिए। रिपोर्ट के अनुसार, 1987 में संविधान संशोधन के बाद सरकारी लेखा-परीक्षा फिर शुरू होने के बाद यह पहली बार है जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने संसद में सर्वोच्च न्यायालय की सरकारी लेखा-परीक्षा के दौरान सांसदों के सवालों के जवाब दिए।
इस खबर का अर्थ
यह विवाद सिर्फ एक उम्मीदवार की नियुक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने मुख्य न्यायाधीश—जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सिफारिश करते हैं—राष्ट्रपति—जो उन्हें नियुक्त करते हैं—और सहमति की प्रक्रिया संभालने वाली संसद के बीच अधिकारों के बंटवारे के सवाल को सार्वजनिक रूप से उजागर किया है। खास तौर पर, मुख्य न्यायाधीश ने संसद की ओर से सिफारिश-अधिकार से जुड़े सवालों को न्यायिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप बताया है। ऐसे में यह भी मुद्दा बन गया है कि संसद उच्च न्यायिक संस्थाओं के प्रमुख से किस हद तक स्पष्टीकरण मांग सकती है। दूसरी ओर, रिपोर्ट में दिए गए पक्षों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संसद के सवाल और गवाह संबंधी प्रक्रिया अधिकारों के इस्तेमाल पर राजनीतिक निगरानी हैं या न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लंघन कर सकते हैं।
यह जनता के लिए यह देखने का अवसर हो सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता किन सिद्धांतों पर काम करती है। हालांकि, मौजूदा रिपोर्ट यह नहीं बताती कि इस विवाद से मुकदमों या लोगों के अधिकारों में कोई ठोस बदलाव आया है। उदाहरण के लिए, जो पाठक आगे यह देखना चाहते हैं कि फिर से सिफारिश की जाती है या नहीं, उन्हें राजनीतिक दावों, वास्तविक प्रक्रिया की प्रगति और उस पर होने वाले कानूनी फैसले को अलग-अलग समझकर देखना चाहिए।
राष्ट्रपति कार्यालय की वरिष्ठ प्रवक्ता कांग यू-जंग ने मुख्य न्यायाधीश चो के बयान पर कहा कि पहले के रुख में कोई बदलाव नहीं है और फिर से सिफारिश की प्रक्रिया शीघ्र आगे बढ़ाने का आग्रह किया। इसलिए अगला मुद्दा यह है कि न केवल दोनों पक्षों के सार्वजनिक रुख में कोई दूरी कम हुई है या नहीं, बल्कि उम्मीदवार की सिफारिश की प्रक्रिया वास्तव में आगे कैसे बढ़ती है।
संबंधित व्यवस्था और सहायता संबंधी जानकारी
एक आंतरिक कानूनी मार्गदर्शिका अधिकार-विवाद न्यायनिर्णयन (권한쟁의심판) को ऐसी प्रक्रिया बताती है जिसमें कोई सरकारी संस्था या स्थानीय निकाय यह दावा करता है कि उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या उल्लंघन का जोखिम है। मार्गदर्शिका के अनुसार, व्यक्ति इस प्रक्रिया के लिए याचिका दायर नहीं कर सकते। याचिका की समय-सीमा की दोनों शर्तें पूरी होनी चाहिए: कारण का पता चलने के 60 दिनों के भीतर और कारण घटित होने के 180 दिनों के भीतर।
हालांकि, यह मार्गदर्शिका सामान्य व्यवस्था की जानकारी देती है। मौजूदा सिफारिश-विवाद में किसने अधिकार-विवाद न्यायनिर्णयन के लिए याचिका दायर की है, याचिका की शर्तें पूरी होती हैं या नहीं, या वास्तव में कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जाएगी—यह लेख में स्पष्ट नहीं है। इसलिए यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि इस मामले में अधिकार-विवाद न्यायनिर्णयन लागू होगा।
मार्गदर्शिका यह भी बताती है कि महाभियोग पर निर्णय की प्रक्रिया (탄핵심판) में संसद महाभियोग चलाने का प्रस्ताव पारित करती है और फिर संवैधानिक न्यायालय (헌법재판소) यह तय करता है कि किसी सार्वजनिक पदाधिकारी को पद से हटाया जाए या नहीं। लेख में डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों की ओर से महाभियोग की संभावना का उल्लेख है, लेकिन केवल उस उल्लेख से यह नहीं कहा जा सकता कि महाभियोग चलाने का प्रस्ताव पारित हो चुका है या संवैधानिक न्यायालय में सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
पुष्ट तथ्य और वे बातें जो अभी अज्ञात हैं
पुष्ट तथ्य
- मुख्य न्यायाधीश चो ही-दाए ने 6 अक्टूबर 2026 को संसद की विधायी एवं न्यायिक मामलों की समिति में सर्वोच्च न्यायालय की सरकारी लेखा-परीक्षा में भाग लिया।
- मुख्य न्यायाधीश चो ने कहा कि राष्ट्रपति के साथ पहले से परामर्श करने का कोई संवैधानिक आधार नहीं है और परामर्श न करने में संवैधानिक रूप से कोई समस्या नहीं है।
- रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति कार्यालय ने ताएगू जिला न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश सोन बोंग-गी की उम्मीदवारी की सिफारिश लौटा दी है और फिर से सिफारिश करने की मांग कर रहा है।
- मुख्य न्यायाधीश चो ने गवाह की शपथ लेने से इनकार किया, लेकिन समिति अध्यक्ष द्वारा जाने की अनुमति न दिए जाने के कारण सुनवाई कक्ष में रहकर सांसदों के सवालों के जवाब दिए।
- राष्ट्रपति कार्यालय की वरिष्ठ प्रवक्ता कांग यू-जंग ने पहले का रुख कायम रखते हुए फिर से सिफारिश की प्रक्रिया शीघ्र आगे बढ़ाने की मांग की।
वे बातें जो अभी अज्ञात हैं
- क्या मुख्य न्यायाधीश चो सोन बोंग-गी की फिर से सिफारिश करेंगे।
- राष्ट्रपति कार्यालय द्वारा सिफारिश लौटाने और फिर से सिफारिश की मांग करने पर अंतिम कानूनी फैसला क्या होगा।
- क्या अधिकारों को लेकर यह विवाद किसी अलग संवैधानिक प्रक्रिया तक पहुंचेगा और, यदि पहुंचेगा, तो उसका नतीजा क्या होगा।
पाठकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें
- राष्ट्रपति कार्यालय की फिर से सिफारिश करने की मांग और मुख्य न्यायाधीश की प्रतिक्रिया पर आगे की घोषणाएं देखें, ताकि पता चले कि उम्मीदवार की सिफारिश की प्रक्रिया वास्तव में कैसे आगे बढ़ती है।
- राजनेताओं की कानूनी व्याख्याओं या महाभियोग संबंधी बयानों को अंतिम कानूनी फैसले से अलग रखें। मौजूदा लेख में किसी अंतिम फैसले या महाभियोग प्रस्ताव के पारित होने की पुष्टि नहीं है।
- यदि अधिकार-विवाद न्यायनिर्णयन या महाभियोग पर निर्णय की प्रक्रिया का उल्लेख हो, तो जांचें कि वास्तव में किसने कौन-सी प्रक्रिया शुरू की है और उसकी आवश्यक शर्तें क्या हैं। यह भी ध्यान रखें कि व्यक्ति अधिकार-विवाद न्यायनिर्णयन के लिए याचिका दायर नहीं कर सकते।
संदर्भ
- अन्य संवैधानिक मुद्दों और संवैधानिक न्यायनिर्णयन प्रक्रिया की मार्गदर्शिका
- संदर्भित अन्य रिपोर्ट: chosun.com
- संदर्भित अन्य रिपोर्ट: hani.co.kr




















