लोकप्रियता में गिरावट थमी, लेकिन संकट अभी खत्म नहीं हुआ

दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्यांग की लोकप्रियता में लगातार गिरावट फिलहाल रुकती दिखी है। सितंबर के अंत में हुए एक सर्वेक्षण में ३८.५ प्रतिशत लोगों ने उनके कामकाज को सकारात्मक और ५७.८ प्रतिशत ने नकारात्मक बताया। दो सप्ताह पहले सकारात्मक आकलन ३५.९ प्रतिशत और नकारात्मक आकलन ५९.४ प्रतिशत था।

अक्टूबर की शुरुआत में जारी एक दूसरे राष्ट्रीय सर्वेक्षण में राष्ट्रपति के कामकाज को ४३ प्रतिशत लोगों ने सकारात्मक और ५० प्रतिशत ने नकारात्मक माना। अलग-अलग सर्वेक्षणों के आंकड़ों में अंतर हो सकता है, क्योंकि सर्वेक्षण का समय, प्रश्न पूछने का तरीका और नमूने में शामिल लोगों का चयन अलग होता है। फिर भी, दोनों आंकड़े यह संकेत देते हैं कि नकारात्मक राय सकारात्मक राय से अधिक है।

थोड़े समय के लिए गिरावट रुक जाना और भरोसा लौट आना एक ही बात नहीं है। राष्ट्रपति के सामने अब लोकप्रियता को स्थिर करने के साथ यह समझने की चुनौती है कि असंतुष्ट मतदाताओं को वापस कैसे जोड़ा जाए।

चार महीने में समर्थन का बड़ा उलटफेर

मई में, राष्ट्रपति चुनाव के आसपास, ली जे-म्यांग की लोकप्रियता काफी ऊँची थी। एक सर्वेक्षण के संयुक्त आंकड़ों में उस समय ६३ प्रतिशत सकारात्मक और २८ प्रतिशत नकारात्मक राय थी। सितंबर तक तस्वीर बदल गई: सकारात्मक राय ३८ प्रतिशत रह गई, जबकि नकारात्मक राय ५३ प्रतिशत तक पहुँच गई। यानी कुछ ही महीनों में समर्थन करीब आधा रह गया।

यह बदलाव केवल किसी एक इलाके या उम्र के समूह तक सीमित नहीं था। सर्वेक्षणों में अलग-अलग क्षेत्रों, आयु वर्गों और राजनीतिक विचारधाराओं के लोगों के बीच समर्थन घटा। फिर भी, राजनीतिक रूप से बीच की राय रखने वाले मतदाताओं का रुख खास तौर पर महत्वपूर्ण दिखाई देता है।

  • मई में मध्यमार्गी मतदाताओं में ६४ प्रतिशत राष्ट्रपति के कामकाज से संतुष्ट थे और २६ प्रतिशत असंतुष्ट।
  • सितंबर में मध्यमार्गी समूह में सकारात्मक राय घटकर ३७ प्रतिशत हुई और नकारात्मक राय बढ़कर ५३ प्रतिशत हो गई।
  • प्रगतिशील मतदाताओं में भी सकारात्मक राय ९१ प्रतिशत से घटकर ६२ प्रतिशत हुई, जबकि नकारात्मक राय ७ प्रतिशत से बढ़कर ३३ प्रतिशत पहुँची।

यहाँ “मध्यमार्गी” से आशय उन मतदाताओं से है जो आम तौर पर किसी एक राजनीतिक खेमे के साथ स्थायी रूप से नहीं रहते। चुनाव में वे नीतियों, नेतृत्व और मौजूदा हालात को देखकर अपना फैसला बदल सकते हैं। इसलिए उनका समर्थन किसी सरकार की व्यापक स्वीकार्यता का संकेत भी माना जाता है।


गिरावट क्यों रुकी—और क्या वह फिर बढ़ सकती है?

लोकप्रियता में हालिया ठहराव के पीछे दो संभावित वजहें सामने रखी गई हैं। पहली, राष्ट्रपति की ओर से खेद जताने के बाद जनता का गुस्सा कुछ कम हुआ हो सकता है। सितंबर में ली ने संवाददाता सम्मेलन में गंभीरता से सिर झुकाकर माफी मांगी थी और अगले दिन कानून मंत्री पद के लिए नामित व्यक्ति ने पद छोड़ दिया। इस क्रम ने कुछ लोगों को यह संकेत दिया होगा कि सरकार जनता की नाराजगी को सुन रही है।

दूसरी संभावना यह है कि लोकप्रियता पहले ही अपने अपेक्षाकृत निचले स्तर तक पहुँच चुकी हो। राजनीतिक सर्वेक्षणों में किसी नेता का समर्थन लगातार गिरने के बाद एक ऐसे स्तर पर टिक सकता है जहाँ उसके सबसे वफादार समर्थक साथ बने रहते हैं। इसे अक्सर “पक्का समर्थन आधार” कहा जाता है—जैसे किसी दुकान के नियमित ग्राहक, जो अस्थायी नाराजगी के बावजूद उसे पूरी तरह छोड़कर नहीं जाते।

लेकिन ऐसे समर्थकों का होना अपने आप में व्यापक भरोसे की वापसी नहीं है। यदि असंतुष्ट और अनिश्चित मतदाता सरकार से दूर बने रहते हैं, तो लोकप्रियता एक सीमित स्तर पर अटक सकती है। इसके उलट, कोई नया विवाद या नीतिगत असहमति उसे फिर नीचे भी धकेल सकती है।

सबसे अहम सवाल: कौन दूर गया?

राष्ट्रपति और उनकी पार्टी के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि लोकप्रियता घटी है। उन्हें यह भी समझना होगा कि कौन से मतदाता दूर हुए, क्यों हुए और किन परिस्थितियों में लौट सकते हैं। इसी आधार पर सरकार को तय करना होगा कि वह मुख्य रूप से अपने पुराने समर्थकों को संबोधित करे या उन लोगों तक पहुँचे जो अब तक किसी एक खेमे में पूरी तरह शामिल नहीं हैं।

एक राजनीतिक विश्लेषण में राष्ट्रपति पद के शुरुआती दौर और सितंबर के आंकड़ों की तुलना की गई। उसके मुताबिक, प्रगतिशील मतदाताओं में समर्थन लगभग ७९.२ प्रतिशत से घटकर ५३.४ प्रतिशत हुआ, जबकि मध्यमार्गी मतदाताओं में यह ६५.९ प्रतिशत से घटकर ३९.५ प्रतिशत रह गया। इन आंकड़ों के अनुसार, दोनों समूहों में समर्थन घटा, लेकिन मध्यमार्गी मतदाताओं का पीछे हटना विशेष रूप से बड़ा था।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि केवल अपने सबसे भरोसेमंद समर्थकों को संतुष्ट करने वाली राजनीति से राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन वापस पाना मुश्किल हो सकता है। मध्यमार्गी मतदाता अक्सर यह देखते हैं कि सरकार रोजमर्रा की समस्याओं—जैसे रोजगार, महँगाई, आवास और सार्वजनिक सेवाओं—पर क्या कर रही है और क्या उसके फैसले उचित लगते हैं।


“घर के मतदाता” और “बाहर के मतदाता” की बहस

राजनीतिक दलों के सामने लंबे समय से एक चुनाव रहता है: पहले अपने पक्के समर्थकों को साथ रखा जाए या उन मतदाताओं तक पहुँचा जाए जो अभी निर्णय पर नहीं पहुँचे हैं। इन्हें कभी-कभी “घर के मतदाता” और “बाहर के मतदाता” के रूपक से समझाया जाता है। पार्टी के भीतर नेतृत्व चुनने की प्रक्रिया में वफादार समर्थक निर्णायक हो सकते हैं, जबकि देशव्यापी चुनाव में नए और अनिश्चित मतदाताओं का समर्थन जीतना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

यह कोई ऐसा नियम नहीं है जो हर चुनाव में एक जैसा लागू हो। चुनाव का समय, विरोधी दलों की स्थिति, आर्थिक हालात और जनता की प्राथमिकताएँ रणनीति को बदल सकती हैं। फिर भी, किसी सरकार को लंबे समय तक चलाने और बड़े सुधार लागू करने के लिए अक्सर अपने पारंपरिक समर्थकों से आगे व्यापक जनसमर्थन की जरूरत होती है।

लेख का तर्क है कि ली जे-म्यांग और उनकी पार्टी को इस समय मध्यमार्गी मतदाताओं का भरोसा लौटाने को प्राथमिकता देनी चाहिए। राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने देश के लोकतांत्रिक संकट से निपटने और व्यावहारिक, मध्यमार्गी शासन—दोनों का संदेश दिया था। अब, लेख के अनुसार, संकट से निपटने के बाद उन्हें व्यावहारिक शासन के वादे को नीतियों में दिखाना होगा।

मूल समर्थकों को ध्यान में रखते हुए भी सरकार व्यापक मतदाताओं से संवाद कर सकती है। लेकिन यदि हर फैसला केवल सबसे मुखर समर्थक समूह की पसंद के अनुसार हो, तो बीच के मतदाताओं तक पहुँचना कठिन हो सकता है।

समर्थन आधार और व्यावहारिकता में संतुलन

मध्यमार्गी रुख अपनाने का अर्थ अपने मूल राजनीतिक मूल्यों को छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ हो सकता है कि सरकार लक्ष्य स्पष्ट रखे, लेकिन उन तक पहुँचने का ऐसा रास्ता चुने जिसे अधिक लोग समझ सकें और स्वीकार कर सकें। उदाहरण के लिए, किसी बड़े संस्थागत सुधार पर केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि वह क्यों जरूरी है; सरकार को यह भी समझाना होगा कि आम नागरिक को उसका असर कैसे महसूस होगा और उसे लागू करने में क्या सुरक्षा उपाय होंगे।

लेख के अनुसार, व्यावहारिक दिशा में बढ़ने से मूल समर्थक जरूरी नहीं कि सरकार से दूर हो जाएँ। इसके बजाय, यदि उन्हें भरोसा हो कि सरकार अपने लक्ष्य हासिल करने में सक्षम है, तो वे अधिक आत्मविश्वास के साथ साथ रह सकते हैं। दूसरी ओर, यदि सरकार केवल अपने समर्थक आधार को खुश रखने पर ध्यान दे, तो उससे बाहर के मतदाताओं को लौटने का कारण नहीं मिलेगा।

यह रणनीतिक चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रपति की लोकप्रियता केवल छवि का सवाल नहीं होती। उससे यह भी तय होता है कि सरकार को संसद और जनता के बीच अपनी नीतियों के लिए कितना सहयोग मिल सकता है।


लोकप्रियता शासन की क्षमता को कैसे प्रभावित करती है?

राष्ट्रपति प्रणाली में जनसमर्थन सरकार की राजनीतिक ताकत का एक अहम आधार होता है। लोकप्रियता अधिक होने पर सरकार को कठिन फैसले समझाने, सहयोग जुटाने और विरोध का सामना करने में अपेक्षाकृत आसानी हो सकती है। समर्थन कम होने पर वही प्रस्ताव संदेह या विरोध का सामना कर सकता है, भले ही सरकार उसे जरूरी मानती हो।

यह एक चक्र की तरह काम कर सकता है: सरकार प्रभावी नतीजे नहीं देती, तो उसका समर्थन घटता है; समर्थन घटने पर नीतियाँ लागू करना कठिन होता है; और नीतियाँ अटकने से सरकार की साख और कमजोर हो सकती है। इसलिए लोकप्रियता को केवल चुनावी अंक की तरह नहीं, बल्कि शासन चलाने की क्षमता से जुड़े संकेतक के रूप में भी देखा जाता है।

ली सरकार की बड़ी योजनाओं में तीन व्यापक परियोजनाएँ शामिल बताई गई हैं। यदि राष्ट्रपति का जनसमर्थन कमजोर रहता है, तो इन योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी राजनीतिक ऊर्जा और सहमति जुटाना मुश्किल हो सकता है। उनका स्वरूप और प्रभाव चाहे जो हो, बड़े राष्ट्रीय कार्यक्रमों को आम तौर पर बजट, प्रशासनिक तैयारी और अलग-अलग समूहों के सहयोग की जरूरत पड़ती है।

  • कम समर्थन से सरकार के लिए अपने फैसलों का सार्वजनिक औचित्य समझाना कठिन हो सकता है।
  • संसद में कानून या बजट से जुड़े प्रस्तावों पर सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
  • जनता का भरोसा कमजोर हो तो विरोधी पक्ष के लिए सरकार पर दबाव बनाना आसान हो सकता है।
  • लंबे समय तक नतीजे न दिखने पर सुधारों की निरंतरता भी खतरे में पड़ सकती है।

इसीलिए लोकप्रियता और कामकाज का रिश्ता दोतरफा है। अच्छे नतीजे समर्थन बढ़ा सकते हैं, लेकिन समर्थन ही वह राजनीतिक पूँजी भी है जो सरकार को नतीजे देने का अवसर देती है।


किम योंग-सैम से सबक: ऊँचे समर्थन से सुधारों को गति

दक्षिण कोरिया के पूर्व राष्ट्रपति किम योंग-सैम के शुरुआती कार्यकाल का उदाहरण दिखाता है कि मजबूत जनसमर्थन तेज सुधारों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है। वर्ष १९९३ में उन्होंने सरकारी अधिकारियों की संपत्ति सार्वजनिक करने, सेना के भीतर प्रभावशाली गुट को खत्म करने और वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता बढ़ाने जैसे कदम उठाए। इन उपायों को लागू करने के लिए राजनीतिक नेतृत्व के साथ जनता का समर्थन भी महत्वपूर्ण था।

किम के संस्मरणों में यह विचार सामने आता है कि सुधारों की सफलता केवल नेता की इच्छाशक्ति से तय नहीं होती। सुधारों को चुनौती देने वाली शक्तियों का सामना करने की क्षमता और जनता का सहयोग—दोनों जरूरी हैं। कई सुधारों से लोगों या संस्थाओं को तत्काल कठिनाई भी हो सकती है; ऐसे में सरकार को यह समझाना पड़ता है कि बदलाव क्यों जरूरी है और उसका लाभ किसे मिलेगा।

लेकिन उनके कार्यकाल का बाद का दौर एक चेतावनी भी देता है। दिसंबर १९९६ में संसद में श्रम कानून में बदलाव को तेजी से पारित कराने के तरीके पर बड़ा विवाद हुआ। आलोचना का केंद्र यह था कि कानून को पर्याप्त सहमति और प्रक्रिया के बिना आगे बढ़ाया गया। इस विवाद ने सरकार की राजनीतिक स्थिति को नुकसान पहुँचाया।

यह उदाहरण बताता है कि सुधार का उद्देश्य जरूरी हो सकता है, लेकिन उसे लागू करने का तरीका और समय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। कमजोर पड़ते जनसमर्थन के बीच जल्दबाजी में लिया गया फैसला सरकार के लिए उलटा असर पैदा कर सकता है। नीतियों के लाभ का दावा, प्रक्रिया की वैधता और जनता की सहमति—इन सभी का संतुलन जरूरी है।

किम के अनुभव से निकलने वाले संकेत

  • मजबूत जनसमर्थन कठिन सुधारों को लागू करने में मदद कर सकता है।
  • केवल सत्ता में होना पर्याप्त नहीं; सुधारों को समझाने और उनका सामाजिक बोझ बाँटने की सहमति भी चाहिए।
  • कार्यकाल के अंतिम हिस्से में बड़े फैसलों के लिए समर्थन जुटाना अधिक कठिन हो सकता है।
  • नीतिगत लक्ष्य से असहमति और उसे लागू करने की प्रक्रिया से असहमति—दो अलग बातें हैं; सरकार को दोनों का जवाब देना चाहिए।

रो मू-ह्यॉन से सबक: दूरदृष्टि जरूरी, पर लोगों को साथ लेकर

पूर्व राष्ट्रपति रो मू-ह्यॉन के कार्यकाल पर चर्चा करते हुए उनके पूर्व भाषण-योजना अधिकारी यून ताए-यंग ने यह बात कही थी कि कम लोकप्रियता के समय उचित और तर्कसंगत प्रस्ताव भी आसानी से स्वीकार नहीं किए जाते। इसके उलट, जब राष्ट्रपति का समर्थन ऊँचा होता है, तो जनता सरकार की बात सुनने और प्रस्तावों पर विचार करने के लिए अधिक तैयार हो सकती है।

रो को भविष्य की चुनौतियों पर पहले से सोचने वाला नेता माना गया। लेकिन उनके अनुभव से यह सवाल भी उठता है कि क्या सरकार को जनता से बहुत आगे निकलकर काम करना चाहिए। किसी दिशा में बहुत दूर देखने के बजाय, कुछ कदम आगे की योजना बनाकर उसे लोगों को समझाना अधिक प्रभावी हो सकता है।

इसका मतलब यह नहीं कि सरकार को केवल लोकप्रिय फैसले लेने चाहिए या लंबे समय के बदलावों से बचना चाहिए। बात यह है कि दूरगामी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए बीच के पड़ाव तय किए जाएँ। जैसे किसी शहर में परिवहन व्यवस्था बदलने की योजना हो, तो सरकार को केवल अंतिम नक्शा नहीं दिखाना चाहिए; उसे यह भी बताना चाहिए कि पहले कौन-सा मार्ग बदलेगा, यात्रियों को असुविधा कैसे कम होगी और सुधार के नतीजे कब दिखाई देंगे।

जनता को साथ लेने के लिए केवल सही दिशा चुनना काफी नहीं। सरकार को यह भी दिखाना होता है कि उस दिशा तक पहुँचने का रास्ता समझ में आता है और लोगों की चिंताओं का जवाब देता है।

रो मू-ह्यॉन के अनुभव और किम योंग-सैम के सुधारों को साथ रखकर देखें, तो एक साझा संदेश निकलता है: नेतृत्व और दृष्टि जरूरी हैं, लेकिन उन्हें जनता के भरोसे, सही समय और प्रभावी संवाद से जोड़ना पड़ता है।


ली हे-चान की सीख: मूल्य इतिहास से, तरीका वास्तविकता से

पूर्व प्रधानमंत्री और राजनीतिक नेता ली हे-चान ने अपने विचारों में चरमपंथी या कट्टर रुख के बजाय लगातार सुधार की राह पर जोर दिया था। उनका मूल संदेश था: मूल्य इतिहास से सीखें, लेकिन उन्हें हासिल करने का तरीका मौजूदा वास्तविकता के अनुसार चुनें।

इस विचार को रोजमर्रा के उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि किसी स्कूल का लक्ष्य सभी बच्चों को बेहतर शिक्षा देना है, तो लक्ष्य पर सहमति होने के बावजूद उसे लागू करने के तरीके पर मतभेद हो सकते हैं। कहीं अतिरिक्त शिक्षक नियुक्त करना सही रास्ता हो सकता है, कहीं पाठ्यक्रम बदलना; हर जगह एक ही उपाय लागू करने से समस्या हल नहीं होगी। राजनीति में भी सिद्धांत बनाए रखते हुए परिस्थितियों के अनुसार नीति का रास्ता चुनना पड़ता है।

ली हे-चान के अनुसार, जो व्यक्ति हर बार एक छोर से दूसरे छोर तक जाता है, वह समाज में स्थायी बदलाव नहीं ला पाता। लगातार मेहनत करने वाला सुधारवादी—जो लक्ष्य को गंभीरता से ले, लेकिन साधनों के बारे में यथार्थवादी रहे—अधिक योगदान दे सकता है। यह बात ली जे-म्यांग की सरकार के लिए भी एक कसौटी बनती है: क्या वह अपने घोषित मूल्यों को बनाए रखते हुए व्यापक सहमति के लिए तरीके बदल सकती है?

दलगत दबाव और राष्ट्रपति के फैसले

लेख में राष्ट्रपति के कुछ हालिया फैसलों को इस चिंता से जोड़ा गया है कि सरकार अपने मूल समर्थकों की प्रतिक्रिया से जरूरत से ज्यादा प्रभावित हो सकती है। आपराधिक प्रक्रिया कानून में बदलाव के दौरान राष्ट्रपति ने अभियोजकों को सीमित परिस्थितियों में अतिरिक्त जाँच का अधिकार देने की बात कही थी, लेकिन पार्टी के भीतर विरोध के बाद वह प्रस्ताव छोड़ दिया गया। एक प्रमुख अपराध-जाँच संस्था के प्रमुख पद के लिए नामित व्यक्ति की नियुक्ति भी विरोध के बाद आगे नहीं बढ़ी।

इन घटनाओं को देखकर यह प्रश्न उठता है कि क्या सरकार नीतिगत निर्णय जनता के व्यापक हित और प्रशासनिक तर्क से ले रही है, या पार्टी के प्रभावशाली समूहों की असहमति से बचने के लिए पीछे हट रही है। यह लेख का राजनीतिक आकलन है; इन फैसलों की सही कसौटी उनके पूरे संदर्भ, कानूनी पक्ष और सरकार के स्पष्टीकरण के आधार पर तय होनी चाहिए।


आगे की राजनीति पर असर

कम लोकप्रियता का असर केवल राष्ट्रपति के दैनिक कामकाज तक सीमित नहीं रह सकता। लेख में आने वाले स्थानीय चुनावों और २०२८ के संसदीय चुनाव को लेकर चिंता जताई गई है। यदि सत्तारूढ़ दल इन चुनावों में कमजोर पड़ता है, तो आगे होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में भी उसकी स्थिति कठिन हो सकती है। चुनावी हार से उन सुधारों की निरंतरता पर असर पड़ सकता है जिन्हें सरकार न्याय व्यवस्था और अभियोजन तंत्र में बदलाव सहित आगे बढ़ाना चाहती है।

यह भविष्य निश्चित नहीं है। चुनावों तक जनता की प्राथमिकताएँ बदल सकती हैं, आर्थिक हालात में सुधार या गिरावट आ सकती है और सरकार के फैसले भी मतदाताओं की राय बदल सकते हैं। फिर भी, आज का समर्थन बताता है कि सरकार को भरोसा लौटाने के लिए केवल राजनीतिक नारे नहीं, बल्कि ऐसे नतीजे देने होंगे जिन्हें लोग अपने जीवन में महसूस कर सकें।

मध्यमार्गी मतदाताओं को वापस जोड़ने के लिए सरकार कुछ व्यावहारिक कदमों पर ध्यान दे सकती है:

  • नीतियों की साफ व्याख्या: हर बड़े फैसले का उद्देश्य, संभावित लागत और आम लोगों पर असर सरल भाषा में बताया जाए।
  • समयबद्ध नतीजे: लंबी अवधि की योजनाओं के साथ ऐसे छोटे पड़ाव रखे जाएँ जिनकी प्रगति जनता देख सके।
  • असहमति का जवाब: आलोचना को केवल विरोधी राजनीति कहकर खारिज करने के बजाय, उसके तथ्यात्मक और नीतिगत पक्ष पर प्रतिक्रिया दी जाए।
  • सहमति बनाने की प्रक्रिया: संसद, पार्टी और नागरिक समूहों से बातचीत के लिए समय रखा जाए, खासकर जब फैसले बड़े या विवादास्पद हों।
  • मूल्यों और तरीकों में फर्क: सरकार अपने लक्ष्य स्पष्ट रखे, लेकिन लक्ष्य तक पहुँचने के व्यावहारिक साधनों पर लचीलापन दिखाए।

निष्कर्ष: समर्थन का विस्तार ही शासन की ताकत

किम योंग-सैम का अनुभव बताता है कि जनसमर्थन बड़े सुधारों को गति दे सकता है, लेकिन कमजोर सहमति और विवादास्पद प्रक्रिया सरकार को नुकसान पहुँचा सकती है। रो मू-ह्यॉन का दौर याद दिलाता है कि दूरदृष्टि के साथ जनता को कदम-दर-कदम समझाना जरूरी है। ली हे-चान का संदेश इन दोनों बातों को जोड़ता है: मूल्यों पर टिके रहें, पर काम करने का तरीका वास्तविकता के अनुरूप रखें।

ली जे-म्यांग के सामने चुनौती अपने पुराने समर्थकों और मध्यमार्गी मतदाताओं में से किसी एक को चुनने की नहीं, बल्कि व्यापक भरोसा फिर से बनाने की है। सरकार को अपने वादों पर कायम रहते हुए ऐसे फैसले लेने होंगे जिन्हें अधिक लोग समझें, जिनकी प्रक्रिया पर भरोसा कर सकें और जिनका लाभ अपने जीवन में देख सकें।

यदि समर्थन केवल एक सीमित राजनीतिक आधार में सिमट गया, तो बड़े सुधारों और राष्ट्रीय योजनाओं को आगे बढ़ाना कठिन हो सकता है। लेकिन यदि राष्ट्रपति अपनी नीतियों को स्पष्ट, व्यावहारिक और व्यापक सहमति पर आधारित बना पाएँ, तो मौजूदा गिरावट को पलटने का अवसर अभी भी मौजूद है।